पशु तस्करी का खेल, जंगलों से उठ रही मूक चीखें : पुलिस और तस्करों के बीच ‘आंख-मिचौली’

यशभारत डिंडोरी |डिंडौरी जिले के बजाग और करंजिया थाना क्षेत्रों में पशु तस्करी का कथित नेटवर्क सक्रिय होने के आरोप सामने आ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर पशु संरक्षण से जुड़े लोगों का दावा है कि क्षेत्र में पशुओं को एकत्र कर वाहनों में लोड किए जाने और दूसरे क्षेत्रों की ओर ले जाने का सिलसिला चल रहा है। इसके बावजूद संबंधित थाना पुलिस की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
बताया जा रहा है कि बैगाचक क्षेत्र के कुछ गांवों में पशुओं को एकत्र करने के बाद वाहनों में लोड किए जाने की चर्चा है। स्थानीय लोगों और समाजसेवकों का दावा है कि उन्हें कथित ठिकानों और आवाजाही की जानकारी है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि स्थानीय स्तर पर लोगों को इसकी भनक लग रही है तो पुलिस का खुफिया तंत्र इस गतिविधि तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है?
पशु परिवहन को लेकर जिले के शहपुरा और मेहंदवानी क्षेत्रों तथा मंडला जिले के मवई क्षेत्र में वाहनों की कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। इसके विपरीत बजाग और करंजिया क्षेत्र में कथित गतिविधियों को लेकर कार्रवाई का अभाव सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और किसी विशेष वाहन अथवा व्यक्ति की संलिप्तता की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।
क्या पुलिस तक नहीं पहुंच रही सूचना?
यदि क्षेत्र में वास्तव में बड़े पैमाने पर पशुओं की आवाजाही हो रही है तो पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पुलिस के पास स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र और गोपनीय सूत्रों का नेटवर्क होता है। इसके बावजूद कथित तस्करी की जानकारी पुलिस तक नहीं पहुंचना या सूचना मिलने के बाद कार्रवाई नहीं होना जांच का विषय हो सकता है।
जांच में सामने आ सकता है सच
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि पशु तस्करी का नेटवर्क संचालित हो रहा है तो इसके पीछे किसका संरक्षण है और वाहनों की आवाजाही कैसे हो रही है? हालांकि पुलिस की मिलीभगत या किसी अधिकारी-कर्मचारी के संरक्षण का कोई प्रमाण सामने आए बिना इसे तथ्य नहीं माना जा सकता। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
अब देखना होगा कि पुलिस बजाग और करंजिया क्षेत्र में पशुओं की अवैध आवाजाही के आरोपों की जांच करती है या नहीं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो पशु परिवहन से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की आवश्यकता होगी। वहीं यदि शिकायतें तथ्यहीन हैं तो पुलिस की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
सवाल यह है कि जब ग्रामीण और समाजसेवक कथित ठिकानों की जानकारी होने की बात कह रहे हैं, तो पुलिस की कार्रवाई वहां तक कब पहुंचेगी?






