निलंबित उपयंत्री ने किया खुलासा : बंधा हुआ है 5% का खेल, सरपंच से लेकर भोपाल तक सब फेल!: भ्रष्टाचार में सिमटा है रोजगार, बह रही ऊपर तक मलाई की धार?
उपयंत्री ने खोली कमीशन राज की पोल,नीचे से भोपाल तक जाता है कमीशन

मझगवां ,सतना यश भारत। कहते हैं जब पानी सिर से ऊपर निकल जाए, तो समंदर में भी बगावत का तूफान उठ खड़ा होता है…। ऐसा ही कुछ देखने को मिला है सतना जिले में, जहां हाल ही में अपनी पंचायत हिरौंदी में बंदूक लेकर निरीक्षण करने पहुंचने और भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित हुए मझगवां ब्लॉक के उपयंत्री सतीश कुमार समेले ने मीडिया के सामने आकर वो सच उगल दिया है, जिसने जनपद से लेकर भोपाल तक के हुक्मरानों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अक्सर दबी जुबान में कही जाने वाली ‘कमीशन खोरी’ को आज खुद विभाग के सविंदा उपयंत्री ने सरेआम कबूलते हुए सरकार को आईना दिखा दिया है। समेले ने दो टूक शब्दों में कहा, “जनपद से लेकर भोपाल तक ऐसा कौन माई का लाल है जो पैसे नहीं ले रहा ?. अगर कोई नहीं ले रहा, तो अपने बेटे की कसम खाकर हनुमान जी के सामने कह दे!”
निलंबित उपयंत्री ने मीडिया के सामने भ्रष्टाचार के इस दलदल का पूरा चिट्ठा खोलते हुए बताया कि पंचायतों में होने वाले विकास कार्यों की राशि का बंदरबांट पहले से ही तय होता है। उन्होंने अपने बयान में जिन पदाधिकारियों और उनके तय रेट का हवाला दिया है, वह इस प्रकार है|
सरपंच का सीधा हिस्सा
सतीश समेले ने खुलेआम आरोप लगाया कि किसी भी निर्माण कार्य में सबसे पहला और बड़ा हिस्सा सरपंच का होता है, जो सीधे 10 प्रतिशत तय रहता है।
सचिव और उप यंत्री की साठगांठ
उन्होंने साफ कहा कि इस खेल में पंचायत सचिव का 5 प्रतिशत और खुद सब इंजीनियर (उपयंत्री) का भी 5 प्रतिशत कमीशन बंधा हुआ है।
रोजगार सहायक और तकनीकी अमला
बयान के मुताबिक, ग्राम रोजगार सहायक (GRS) को 3 प्रतिशत और तकनीकी स्वीकृति देने वाले सहायक यंत्री (AE) को 2 प्रतिशत का हिस्सा पहुंचाना पड़ता है।
जनपद सीईओ का हिस्सा
समेले ने जनपद स्तर के बड़े अधिकारियों को भी नहीं बख्शा और कहा कि जनपद सीईओ तक 2 से 3 प्रतिशत की राशि सीधे पहुंचाई जाती है।
विशेष फंड की मलाई
उन्होंने यह भी जोड़ा कि डीएमएफ (DMF) या अन्य विशेष ग्रांट से होने वाले बड़े कामों में तो सीधे 10 से 15 प्रतिशत तक की मोटी कमीशन खोरी डंके की चोट पर की जाती है।
सब इंजीनियर सिर्फ वसूली एजेंट,बड़े मगरमच्छ मार रहे मलाई
सतीश कुमार समेले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि आज की तारीख में सब इंजीनियर सिर्फ एक ‘वसूली एजेंट’ बनकर रह गए हैं, जिन्हें हर गड़बड़ी के बाद बलि का बकरा बना दिया जाता है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “चाहे जिला हो, कमिश्नरी हो या भोपाल… चैकिंग के नाम पर आने वाले हर निरीक्षण दल (SQM और NQM) के लिए लाखों रुपयों का सूटकेस तैयार किया जाता है, और यह सूटकेस हम जैसे छोटे कर्मचारियों से ही वसूल करवाकर ऊपर तक पहुंचाया जाता है!
समेले यहीं नहीं रुके, उन्होंने शायरी के अंदाज में भ्रष्ट सिस्टम को खुली चुनौती देते हुए कहा:”जब उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरूरी है, अगर जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है!”
उन्होंने दावा किया कि उनके पास इस पूरे ‘चंदा और सूटकेस सिस्टम’ की कई वॉइस रिकॉर्डिंग और वीडियो प्रमाण के रूप में सुरक्षित हैं। वे इन तमाम सबूतों को बहुत जल्द माननीय उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) के सामने पेश करने जा रहे हैं, ताकि यह साबित हो सके कि भ्रष्टाचार के इस गंदे खेल में जमीनी स्तर के कर्मचारियों से लेकर भोपाल की वातानुकूलित केबिनों में बैठे कौन-कौन से बड़े मगरमच्छ शामिल हैं।
अब देखना यह है कि इस सीधे खुलासे के बाद पंचायत ग्रामीण विकास मंत्रालय और जिला प्रशासन इन ‘सूटकेस वाले मगरमच्छों’ पर क्या हंटर चलाता है, या फिर इस कड़वे सच को भी हमेशा की तरह दबा दिया जाएगा!







