जबलपुरभोपालमध्य प्रदेशराज्य

एक जमाना था जब थाना प्रभारियों की शहर में बोलती थी तूती और अब……..

जबलपुर यश भारत। एक दौर ऐसा भी था जब शहर में पदस्थ कुछ थाना प्रभारियों के नाम की तूती उनके थाना क्षेत्र तो क्या पूरे शहर में बोलती थी। उनके नाम से तत्वों की पतलून ढीली हो जाती थी और असामाजिक तत्व व गुंडे बदमाश भगवान से मनाते थे कि भगवान ना करे कभी इनसे पाला पड़ जाए।जो पुराने लोग हैं उन्हें आज भी ऐसे थाना प्रभारी के नाम मुंह जवानी याद है और आज भी चर्चाओं में लोग इन्हें याद कर लेते हैं। आर सी तिवारी एमबीएस जग्गी सतपाल सिंह सी एन दुबे सलीम खान ताराचंद दुबे सुकांत बनर्जी जैसे नाम का उल्लेख किया जा सकता है। ऐसा नहीं था कि इनके दौर में अपराध नहीं होते थे या गुंडे बदमाश नहीं थे लेकिन इनकी कार्य प्रणाली से गुंडे बदमाश थर-थर कांपते थे। अपराध करने से पहले सौ बार सोचते थी कि यदि इसे पाला पड़ गया तो फिर खैर नहीं। लेकिन अब ऐसा कहां है वर्तमान के थाना प्रभारी में से ज्यादातर तो ऐसे हैं जिनके नाम को उन्हीं के थाना क्षेत्र के लोग नहीं जानते पहचानना तो दूर की बात है। आज तो कोई भी छुट भैया नेता या बदमाश इनसे न केवल उलझ जाता है बल्कि तू तू मैं मैं होना और विवाद बनना तो आम बात हो गई है। दिल्ली में जिस तरह से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई है उसमें कहीं ना कहीं बड़ा योगदान चेंबर में बैठकर थाना चलाने वाले प्रभारियों का ही है कई टीआई तो ऐसी भी होगे जिन्हें शायद अपने थाना क्षेत्र का ही पूरा ज्ञान ना हो ऐसे प्रभारी अपने अधीनस्थों के भरोसे रहते हैं और इसका भरपूर लाभ उनके मातहत और एक्टिव पुलिस कर्मी उठाते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शहर और जिले के कुछ थाने को प्रभारी के बजाय उनके अधीनस्थ ही चला रहे हैं। साहब तो चेंबर में बैठकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर खाना पूर्ति करते रहते हैं।
यह सब शहर की कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। थाना प्रभारी की कौन कहे अब तो वरिष्ठ अधिकारी भी इसी ढांचे में ढले नजर आने लगे हैं जिसका विपरीत परिणाम बढ़ते अपराध और अपराधियों के बुलंद होते हो हौसले हैं।

आशा गोपाल और संजय चौधरी जैसे पुलिस कप्तान भी रहे हैं यह वही जिला है जहां एक समय आशा गोपाल और संजय चौधरी जैसे पुलिस अधीक्षक रहे हैं जिन्हें लोग आज भी याद कर लेते हैं। लेकिन समय के साथ-साथ पूरी पुलिस व्यवस्था भी बदली हुई नजर आ रही है। और इसका परिणाम अराजक कानून व्यवस्था के रूप में जिला वासियों को भुगतना पड़ रहा है। ज्यादातर पुलिस अधिकारी अपना काम ऑफिस में बैठकर ही निपटाने में विश्वास रखते हैं जबकि पहले ऐसा नहीं था। एसपी से लेकर थाना प्रभारी तक ऑफिस के अलावा फील्ड पर भी उतनी मेहनत करते थे जितनी होनी चाहिए लेकिन यह चलाना अब तो पूरी तरह से समाप्त सा नजर आ रहा है। पुलिस चौराहों पर तभी नजर आती है जब कोई चेकिंग अभियान जैसा काम होता है नहीं तो बाकी समय गुणा भाग ऑफिस और घर में ही निकल जाता है ऐसे में तत्वों का खौफ खत्म होना लाजमी है।

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