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5 या 19 दिसंबर को राज्यसभा में हो सकती है कश्मीरी पंडित पुनर्वास विधेयक पर चर्चा और मतदान, विवेक तन्खा को शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी महाराज का मिला आशीर्वाद

कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर राष्ट्रीय पहल तेज — ऐतिहासिक विधेयक को मिली आध्यात्मिक समर्थन की शक्ति

जबलपुर यशभारत। कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, पुनर्स्थापना और न्याय के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से पहल जारी है। राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा द्वारा प्रस्तुत “कश्मीरी पंडित (पुनर्वास, पुनर्स्थापना और न्याय) विधेयक, 2022” को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है, और संसद का शीतकालीन सत्र 1 से 19 दिसंबर तक चलेगा, जिसमें यह विधेयक 5 या 19 दिसंबर को राज्यसभा में चर्चा या मतदान के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है। यह प्रयास कश्मीरी पंडितों की तीन दशक पुरानी पीड़ा को दूर करने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है।

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इसी क्रम में बुधवार को जबलपुर में विवेक तन्खा को द्वारका पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी महाराज का आत्मीय आशीर्वाद प्राप्त हुआ। स्वामी सदानंद जी ने इस विधेयक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि कश्मीरी पंडितों की पीड़ा सिर्फ एक समुदाय का नहीं, पूरे राष्ट्र का नैतिक दायित्व है। उन्होंने इसे न्याय और संवेदना की दिशा में एक सार्थक कदम बताते हुए तन्खा के प्रयासों की प्रशंसा की।

 शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी महाराज ने बताया कि अपने ही देश में वर्षों से विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक वापसी अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के मूल में स्थित है, इसलिए इसके समाधान के लिए संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है।

इसी दिशा में विवेक तन्खा देशभर में चारों शंकराचार्यों से क्रमवार मुलाकात कर रहे हैं, ताकि इस महत्वपूर्ण विधेयक के लिए आध्यात्मिक नेतृत्व का आशीर्वाद और व्यापक समर्थन सुनिश्चित किया जा सके। यह कदम न केवल राजनीतिक औपचारिकता से परे है, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी इस अभियान को गहरी मजबूती देता है।

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विवेक तन्खा ने कहा कि यह विधेयक केवल कागज़ का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की प्रतिष्ठा और न्याय से जुड़े एक ऐतिहासिक दायित्व को पूरा करने की कोशिश है। वे मानते हैं कि संसद में इसके पारित होने से कश्मीरी पंडित समुदाय को नई उम्मीद और सुरक्षा की भावना मिलेगी।

विधेयक को लेकर संसद और संत समाज के बीच बन रहा यह अनूठा समन्वय इस मुद्दे को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में नई ऊर्जा और संवेदनशीलता दे रहा है।

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