बशीर बद्र के निधन से अदब की दुनिया में शोक, भोपाल के शोधकर्ता ने बताईं यादें
छोटे रचनाकारों के लिए हमेशा खुले रहे दरवाजे

बशीर बद्र के निधन से अदब की दुनिया में शोक, भोपाल के शोधकर्ता ने बताईं यादें
डॉ. अंजुम बाराबंकी ने कहा कि बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं, बल्कि नई गजल के ट्रेंड सेटर थे। उन्होंने उर्दू शायरी में ऐसे प्रयोग किए, जिन्होंने गजल की भाषा और शैली को नई पहचान दी। उनका मानना था कि बशीर बद्र के बिना उर्दू शायरी का कोई भी संकलन या चयन पूरा नहीं माना जा सकता। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया था और उनके नाम आज भी शैक्षणिक उत्कृष्टता का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्हें उस दौर में प्रतिष्ठित पुरस्कार और छात्रवृत्तियां मिली थीं, जब इतनी राशि किसी युवा शिक्षक के वेतन से भी अधिक मानी जाती थी।
अंग्रेजी शब्दों को गजल की भाषा में घोलने वाले शायर
डॉ. बाराबंकी के मुताबिक बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों को बेहद सहजता से उर्दू शायरी का हिस्सा बनाया। गिलास, रिबन, सूट जैसे शब्द उनकी गजलों में इस तरह घुले-मिले दिखाई देते हैं कि वे अलग से विदेशी नहीं लगते। उन्होंने शब्दों के चयन और प्रयोग से गजल को नई अभिव्यक्ति दी।
छोटे रचनाकारों के लिए हमेशा खुले रहे दरवाजे
बशीर बद्र के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए डॉ. बाराबंकी ने कहा कि वे हमेशा युवा और नए रचनाकारों को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर रहते थे। शोहरत के शिखर पर पहुंचने के बावजूद उनमें अहंकार नहीं था। वे अपने से जूनियर लेखकों और शायरों को मंच देने, उनका मार्गदर्शन करने और प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे।
हर बड़े गायक ने गाई उनकी गजलें
डॉ. बाराबंकी के अनुसार देश का शायद ही कोई बड़ा गजल गायक या लाइट म्यूजिक कलाकार हो जिसने बशीर बद्र की रचनाओं को आवाज न दी हो। उनकी शायरी आम लोगों से लेकर साहित्यिक मंचों तक समान रूप से लोकप्रिय रही। बशीर बद्र के निधन के साथ उर्दू अदब का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसने गजल को नई भाषा, नया मुहावरा और नई पहचान दी। साहित्य जगत उन्हें एक ऐसे शायर के रूप में याद करेगा, जिसने शब्दों को आम आदमी के दिल तक पहुंचाने का काम किया।
बेहद सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े इंसान
उनके करीबी रिश्तेदार सैयद इफ्तिखार अली और बेटे तय्यब बद्र ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बशीर बद्र केवल बड़े शायर ही नहीं, बल्कि बेहद सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े इंसान थे। उनकी पहचान इतनी व्यापक थी कि भोपाल में उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। सैयद इफ्तिखार अली ने बताया कि जब बशीर बद्र मेरठ से भोपाल आए थे, तब सदर मंजिल के पीछे स्थित वाहिद मंजिल में अक्सर साहित्यिक नशिस्तें हुआ करती थीं। उनकी महफिलों में इतनी भीड़ जुटती थी कि बड़ा मैदान भी छोटा पड़ जाता था। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र को पद्मश्री सम्मान मिला, लेकिन शोहरत के बावजूद उनमें कभी अहंकार नहीं आया।
उन्होंने याद किया कि एक बार दुबई में उनका चश्मा टूट गया था। जब वे उसे ठीक कराने पहुंचे तो दुकानदार ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद बशीर बद्र लगातार भुगतान करने की जिद करते रहे। यह उनके स्वाभिमान और सादगी का बड़ा उदाहरण था।
बेटे तय्यब बद्र ने बताया कि पिछले 10 से 12 वर्षों से उनके पिता डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई थी। हालांकि बुधवार सुबह तक वह सामान्य थे, नाश्ता किया और परिवार के साथ खुश नजर आ रहे थे। तय्यब बद्र के अनुसार दोपहर करीब 12 बजे अचानक उनका ब्लड प्रेशर गिरने लगा और कुछ ही मिनटों में उनकी नब्ज धीमी पड़ गई। डॉक्टरों को बुलाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनके शेर ही उनकी सबसे बड़ी पहचान
अपने पिता को याद करते हुए तय्यब बद्र ने कहा कि लोग अक्सर पूछते हैं कि उन्हें कैसी श्रद्धांजलि दी जानी चाहिए। उनका जवाब हमेशा एक ही रहता है बशीर बद्र को याद करना है तो उनके शेर पढ़िए, वही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि उनके पिता की शायरी उम्मीद, मोहब्बत और इंसानी रिश्तों की गर्माहट से भरी हुई थी। यही वजह है कि उनकी रचनाएं हर पीढ़ी के लोगों के दिलों में जगह बनाती रहीं।
शेरों में जिंदा रहेंगे बशीर बद्र
बेटे ने कहा कि बशीर साहब के कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इनमें सबसे चर्चित शेर उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…इसके अलावा उनका यह शेर भी अक्सर उद्धृत किया जाता है लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में… उन्होंने कहा कि बशीर बद्र के निधन के साथ उर्दू अदब का एक स्वर्णिम अध्याय भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उनकी शायरी आने वाले समय में भी लोगों के दिलों और महफिलों में जिंदा रहेगी।






