
सिया विवाद : CJI ने केंद्र से मांगा जवाब
_ दो IAS अफसरों पर अवैध पर्यावरण मंजूरी का आरोप
आशीष शुक्ला, नई दिल्ली यश भारत।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) के आरोप को गंभीरता से लिया कि राज्य के दो वरिष्ठ IAS अधिकारियों ने जानबूझकर इस हरित निकाय (Green Body) को निष्क्रिय कर दिया और खनन माफिया के साथ आपराधिक गठजोड़ में अवैध रूप से सैकड़ों परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी (ECs) दी। इस पूरे मामले को लेकर यश भारत लगातार समाचार प्रकाशित कर रहा है जिसमें बैठकों के विवाद से लेकर तालाबंदी और फिर अनुमतियों को लेकर भी यश भारत ने समाचार प्रकाशित करें थे। पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट में लगी जनहित याचिका को लेकर भी यश भारत द्वारा सबसे पहले समाचार प्रकाशित किया गया।
SEIAA के अध्यक्ष एस.एन.एस. चौहान ने वरिष्ठ अधिवता उज्ज्वल सिंह गिल्डा के माध्यम से आरोप लगाया कि IAS अधिकारी आर. उमामहेश्वरी (सदस्य सचिव, SEIAA) और श्रीराम शुक्ला (प्रधान सचिव, पर्यावरण विभाग) ने आपराधिक साजिश कर पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 का उल्लंघन किया। आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर SEIAA की बैठकें टाल दीं, अनिवार्य वैधानिक मूल्यांकन को दरकिनार किया और बिना किसी अधिकार के अवैध मंजूरी दी।
चौहान ने कहा कि सदस्य सचिव और शुक्ला का खनन माफिया के साथ आपराधिक गठजोड़ है। उन्होंने राज्य मुय सचिव को 50 से अधिक पत्र लिखे, जिसमें सुधारात्मक कार्रवाई की मांग की गई।
जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने याचिकाकर्ता विजय कुमार दास की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, यह बहुत गंभीर मामला है। दो वरिष्ठ IAS अधिकारी अवैध मंजूरी कैसे दे सकते हैं? राज्य को यह स्पष्ट करना होगा कि स्वतंत्र निकाय SEIAA का या औचित्य है। याचिकाकर्ता दास की ओर से वरिष्ठ अधिवता विवेक तंखा ने दलील दी कि सदस्य सचिव ने अकेले ही 237 पर्यावरणीय मंजूरी अवैध रूप से दीं, जबकि कानून के अनुसार SEIAA की बैठक बुलाना अनिवार्य है। तंखा ने कहा, यह क्लासिक
उदाहरण है कि किस तरह वरिष्ठ अधिकारी निजी स्वार्थों और खनन लॉबी के लिए पर्यावरणीय मंजूरी
का दुरुपयोग कर रहे हैं।
एक सप्ताह में प्रस्तुत करें जबाव
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय
से इस मामले पर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार के वकील को कोर्ट में बुलाया और इस पूरे मामले में केंद्र की ओर से एक सप्ताह के भीतर राज्य सरकार से रिपोर्ट लेकर देने को कहा गया। इस दौरान न्यायालय ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया है।







