मुनाफाखोर डेरी संचालक उड़ा रहे नियमों की धज्जियां, प्रशासन मौन
स्वच्छता और गुणवत्ता पर ध्यान नहीं

जबलपुर यश भारत।शहर में दूध का कारोबार करने वाले कई डेरी संचालक खुलेआम नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। मुनाफाखोरी की होड़ में न केवल महंगा दूध बेचा जा रहा है, बल्कि उपभोक्ताओं को कम मात्रा में दूध देकर भी लूट की जा रही है। संबंधित विभागों की चुप्पी ने इन डेरी संचालकों के हौसले और भी बुलंद कर दिए हैं।
अमानक पॉलिथीन में पैक कर रहे दूध
शहर की कई डेरियों में आधा लीटर, एक लीटर और दो लीटर के पैकेट पहले से अमानक पॉलिथीन में भरकर तैयार कर लिए जाते हैं। ग्राहक को वही पैक थमा दिए जाते हैं। उपभोक्ताओं ने बताया कि जब घर पर दूध को नापा जाता है तो मात्रा कम निकलती है। अमानक पॉलिथीन में दूध भरना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है, बावजूद इसके इसका खुलेआम उपयोग हो रहा है।
डिजिटल पेमेंट से दूरी, टैक्स से बचाव का तरीका
अधिकांश डेरी संचालक डिजिटल पेमेंट की सुविधा नहीं देते। जानकारों का कहना है कि यदि ग्राहक ऑनलाइन भुगतान करेगा तो रकम सीधे खाते में दर्ज होगी, जिससे टैक्स संबंधी जवाबदेही बढ़ेगी और मुनाफाखोरी पर अंकुश लगेगा। इसी से बचने के लिए डेरी संचालक केवल नकद लेनदेन को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।
परिवहन वाहनों की हालत दयनीय
दूध परिवहन के लिए उपयोग में लाए जा रहे वाहन भी सुरक्षा और स्वच्छता मानकों पर खरे नहीं उतरते। कई वाहन पुराने और जर्जर हालत में हैं। न तो फिटनेस सर्टिफिकेट की जांच होती है, न रोड टैक्स और बीमा की। निर्धारित लोडिंग क्षमता से अधिक दूध का परिवहन किया जा रहा है। यातायात पुलिस आम वाहन चालकों की तरह इन वाहनों पर कभी सख्ती नहीं दिखाती।
स्वच्छता और गुणवत्ता पर ध्यान नहीं
डेरी संचालकों द्वारा दूध की स्वच्छता और गुणवत्ता पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अधिकांश डेरियों में कर्मचारियों के पास सिर पर कैप, हाथों में ग्लव्स या स्वच्छ वर्दी तक नहीं होती। साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था न होने से उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है।दूध मापक यंत्रों की भी कभी आकस्मिक जांच नहीं की जाती, जिससे दूध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों संदिग्ध बनी रहती हैं।

प्रशासन की कुंभकरणी नींद
इन गंभीर अनियमितताओं के बावजूद संबंधित विभागों की आंखें बंद हैं। ना तो नगर निगम, ना ही खाद्य सुरक्षा विभाग या परिवहन विभाग ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई की है विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशासन सक्रियता दिखाए तो डेरी संचालकों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। दूध माफिया पर नकेल कसने के लिए सभी डेरी संचालकों का पंजीयन और नियमित निरीक्षण अनिवार्य किया जाए।
* दूध परिवहन वाहनों की फिटनेस, परमिट, रोड टैक्स व बीमा की जांच हो।
* अमानक पॉलिथीन के उपयोग पर तत्काल रोक लगाई जाए।
* डेरी कर्मचारियों के लिए यूनिफॉर्म, ग्लव्स व कैप अनिवार्य हों।
* डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देकर पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
* दूध की गुणवत्ता की समय-समय पर प्रयोगशाला में जांच की जाए।
जनता कर रही है सख्त कार्रवाई की मांग
शहर के उपभोक्ताओं का कहना है कि जब आम वाहन चालकों को मामूली गलती पर चालान काटा जाता है, तो डेरी संचालकों को इतनी छूट क्यों दी जा रही है? अब जरूरत है कि प्रशासन इस “दूध माफिया” पर शिकंजा कसकर जनता को राहत दिलाए।






