मेरा यादगार केस: जब जूतों ने खोल दी हत्या के प्रयास की साजिश

मेरा यादगार केस: जब जूतों ने खोल दी हत्या के प्रयास की साजिश
निरीक्षक जहीर खान, थाना प्रभारी जीआरपी भोपाल
अरविंद कुमार कपिल
भोपाल, यश भारत: मध्य प्रदेश पुलिस के एक ऐसे चेहरे, जिन्होंने बी-फार्मा की पढ़ाई की, प्रदेश में तीसरी रैंक हासिल की और आज अपनी शार्प इन्वेस्टिगेशन के लिए जाने जाते हैं। आज हम बात कर रहे हैं जहीर खान जी से, जिनके लिए पुलिस की नौकरी सिर्फ ड्यूटी नहीं, बल्कि एक साइंटिफिक मिशन है।
प्रश्न: जहीर जी, आपकी पहचान सिर्फ एक शार्प इन्वेस्टिगेटर की नहीं, बल्कि एक जांबाज पुलिस अफसर की भी है। शाहजहानाबाद में वह वाकया आज भी लोग याद करते हैं जब एक युवक आत्महत्या के लिए टावर पर चढ़ गया था। उस समय आपके मन में क्या चल रहा था?
जहीर खान: वह पल वास्तव में बहुत तनावपूर्ण था। एक युवक पारिवारिक कारणों से बहुत ऊंचे मोबाइल टावर पर चढ़ गया था और नीचे कूदने की धमकी दे रहा था। नीचे भारी भीड़ जमा थी। मुझे लगा कि अगर बातचीत में देरी हुई तो कोई अनहोनी हो सकती है। मैंने बिना सोचे खुद टावर पर चढ़ने का फैसला किया। जैसे-जैसे मैं ऊपर जा रहा था, हवा का दबाव बढ़ रहा था, लेकिन मेरा पूरा ध्यान सिर्फ उस युवक की जान बचाने पर था। ऊपर पहुँचकर उसे बातों में उलझाया, भरोसा जीता और आखिरकार उसे सुरक्षित नीचे उतार लाया। वर्दी की असली सार्थकता किसी की जान बचाने में ही है।
प्रश्न: जहीर जी, आपके शानदार करियर में कई बड़े केस रहे एसटीएफ में व्यापमं घोटाला हो या बड़े माफियाओं पर कार्रवाई। लेकिन आपकी नजर में सबसे यादगार केस कौन सा है?
जहीर खान: देखिए, पुलिस की नौकरी में हर दिन एक नई चुनौती होती है। लेकिन अगर आप मुझसे मेरे दिल के करीब या सबसे यादगार केस पूछेंगे, तो वह शाहजहानाबाद का मैकेनिक हफीज केस है। वह केस इसलिए खास नहीं था कि वह बहुत बड़ा अपराध था, बल्कि इसलिए क्योंकि वहां अपराधी ने पुलिस को चुनौती देने के लिए मास्टर-प्लानिंग की थी।
प्रश्न: उस केस में ऐसा क्या था जो आज भी आपके जेहन में ताजा है?
जहीर खान: वह 29 अक्टूबर 2020 की दोपहर थी। आदर्श अस्पताल के पास एक गैराज में मैकेनिक हफीज को अज्ञात बदमाशों ने गोली मारी थी। हमलावर उसे खत्म करने आए थे। चुनौती यह थी कि हमलावर पूरी तरह अदृश्य थे। न कोई गवाह, न कोई सुराग। हमने जब 3.5 किलोमीटर के दायरे में 100 से ज्यादा सीसीटीवी खंगाले, तो हम हैरान रह गए।
प्रश्न: सुना है आरोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए गिरगिट की तरह रंग बदले थे?
जहीर खान: जी बिल्कुल! आरोपियों ने तीन जोड़ी कपड़े अंदर पहन रखे थे। वे एक चौराहे पर लाल शर्ट में दिखते, तो अगले पर काली टी-शर्ट में। वे हर कुछ दूरी पर कपड़े बदल रहे थे ताकि सीसीटीवी फुटेज में उनका हुलिया बदल जाए और पुलिस कन्फ्यूज हो जाए। हम फुटेज देख रहे थे और समझ नहीं आ रहा था कि वो गायब कहाँ हो रहे हैं।
प्रश्न: तो फिर आपने उस अदृश्य अपराधी को कैसे पकड़ा? वह यूरिका मोमेंट क्या था?
जहीर खान: जब पूरी टीम चेहरों और शर्ट के रंगों में उलझी थी, तब मेरी नजर उनके जूतों पर पड़ी। मैंने देखा कि अपराधी ने अपनी शर्ट तो तीन बार बदल ली, लेकिन भागने की हड़बड़ी में वह अपने जूते बदलना भूल गया। मैंने टीम से चिल्लाकर कहा कपड़े मत देखो, सिर्फ जूतों को फॉलो करो! बस, उन जूतों ने हमें परी बाजार से लेकर किलोल पार्क तक का रास्ता दिखा दिया और हम आरोपियों के घर तक जा पहुंचे।
प्रश्न: उस केस का खुलासा होने पर क्या सामने आया?
जहीर खान: पता चला कि यह एक सुपारी किलिंग थी। हफीज के ही एक दोस्त इनामउल्ला सिद्दीकी ने रंजिश में 20 हजार की सुपारी दी थी। वह इतना शातिर था कि खुद को बेगुनाह बताने के लिए उस दिन बीना चला गया था। लेकिन जूतों के उस छोटे से सुराग ने उसकी पूरी सल्तनत ढहा दी।
प्रश्न: एक बी-फार्मा ग्रेजुएट होने का आपको पुलिसिंग में क्या फायदा मिलता है?
जहीर खान: बहुत ज्यादा! फार्मेसी ने मुझे बारीकियों को पकड़ना सिखाया। लैब में एक छोटी सी बूंद जैसे पूरा नतीजा बदल देती है, वैसे ही क्राइम सीन पर जूतों का एक निशान पूरे केस का रुख मोड़ देता है। नाना जी और मम्मी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए मुझे गर्व होता है कि मैं तकनीक और दिमाग से अपराधियों को मात दे पाता हूँ।







