ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन में बड़ी चूक ,जिले में बेलगाम हादसे, सड़कों पर मर रहे लोग
30 हजार का अनुमान, एटीएस पहुंचे सिर्फ 10 हजार…

जबलपुर, यशभारत। शहर और आसपास के इलाकों में लगातार हो रहे सड़क हादसों में लोगों की जान जा रही है। तेज रफ्तार, लापरवाही और यातायात नियमों की अनदेखी के बीच अब कमर्शियल वाहनों की तकनीकी फिटनेस जांच की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। कटंगी बाईपास स्थित खजरी खिरिया के पास संचालित ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) में संभाग के चार जिलों के करीब 30 हजार कमर्शियल वाहनों की सालाना जांच अपेक्षित है, लेकिन वर्तमान में करीब 10 हजार वाहन ही परीक्षण के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे में करीब 20 हजार कमर्शियल वाहनों की फिटनेस किस तरह सुनिश्चित की जा रही है, यह बड़ा सवाल है। क्योंकि सड़क पर दौड़ने वाली बस, ट्रक, हाइवा और अन्य व्यावसायिक वाहनों की तकनीकी स्थिति सीधे सड़क सुरक्षा से जुड़ी है। यदि बिना भौतिक परीक्षण के किसी वाहन को फिटनेस प्रमाणपत्र मिल रहा है तो यह महज नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
हादसों के बीच फिटनेस व्यवस्था पर सवाल …..
जबलपुर में सड़क हादसों की तस्वीर लगातार चिंता बढ़ा रही है। शहर की सड़कों से लेकर बाईपास और हाईवे तक आए दिन दुर्घटनाएं सामने आती हैं। हादसों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन भारी और व्यावसायिक वाहनों की तकनीकी खराबी भी दुर्घटनाओं का एक महत्वपूर्ण जोखिम है।
ऐसे में जिस व्यवस्था का उद्देश्य अनफिट वाहनों को सड़कों से दूर रखना है, उसी व्यवस्था में यदि बड़ी संख्या में वाहन वास्तविक परीक्षण से बाहर रह जाते हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
खराब ब्रेक, घिसे हुए टायर, स्टीयरिंग में खराबी, लाइटिंग सिस्टम की समस्या या अन्य तकनीकी खामी किसी भी वाहन को हादसे का कारण बना सकती है। बस या भारी ट्रक जैसे वाहनों में ऐसी खराबी का परिणाम और भी गंभीर हो सकता है।
30 हजार का अनुमान, एटीएस पहुंचे सिर्फ 10 हजार…
.ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन की शुरुआत मैनुअल फिटनेस जांच में मानवीय हस्तक्षेप कम करने और वाहनों की तकनीकी स्थिति का निष्पक्ष परीक्षण करने के उद्देश्य से की गई थी। मशीनों के जरिए ब्रेक, टायर, लाइट, स्टीयरिंग सहित वाहन के अलग-अलग तकनीकी मानकों की जांच की जानी है।
यह व्यवस्था जबलपुर संभाग के जबलपुर, मंडला, डिंडोरी और नरसिंहपुर जिलों के कमर्शियल वाहनों के लिए महत्वपूर्ण है। अनुमान के मुताबिक करीब 30 हजार वाहनों की सालाना जांच होनी चाहिए, लेकिन केंद्र पर फिलहाल करीब 10 हजार वाहन ही पहुंच रहे हैं। यानी करीब 20 हजार वाहनों का भौतिक परीक्षण ATS में नहीं हो रहा है। यहीं से सड़क सुरक्षा का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जो वाहन ATS तक पहुंच ही नहीं रहे, उनकी फिटनेस कैसे सुनिश्चित हो रही है?
बिना वाहन लाए फिटनेस प्रमाणपत्र के आरोप……..
आरोप हैं कि कुछ वाहन मालिक बिचौलियों और एजेंटों के माध्यम से वाहनों को एटीएस में पेश किए बिना फिटनेस प्रमाणपत्र हासिल कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
वाहन संचालकों द्वारा दूसरे संभागों से फिटनेस प्रमाणपत्र हासिल किए जाने की बात भी सामने आ रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो परिवहन विभाग के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि चारों जिलों के कितने वाहनों की फिटनेस स्थानीय एटीएस में हुई और कितने वाहनों के प्रमाणपत्र दूसरे केंद्रों से जारी किए गए।
क्योंकि केवल प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जिस वाहन को फिट घोषित किया गया, क्या उसे वास्तव में मशीनों के सामने लाकर उसकी तकनीकी जांच की गई थी?
हादसा होने के बाद जांच से बेहतर है पहले वाहन रोकना…..
सड़क दुर्घटना के बाद यह पता लगाना कि वाहन फिट था या नहीं, हादसे की वजह क्या थी और वाहन की तकनीकी स्थिति कैसी थी—यह प्रक्रिया हादसे के बाद शुरू होती है। लेकिन एटीएस जैसी व्यवस्था का उद्देश्य ही यह है कि संभावित खतरे को हादसा होने से पहले पहचान लिया जाए। अगर कोई तकनीकी रूप से खराब वाहन फिटनेस प्रमाणपत्र लेकर सड़क पर पहुंच जाता है तो व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कड़ी वहीं कमजोर हो जाती है। इसलिए यह केवल परिवहन विभाग की कागजी प्रक्रिया का विषय नहीं है। यह सवाल सीधे इस बात से जुड़ा है कि सड़कों पर दौड़ रहे कमर्शियल वाहनों में से कितने वास्तव में सुरक्षित हैं।







