आखिर छोटे कप्तान की चर्चा होने लगी

एसपी ऑफिस के पेड़ के नीचे कुछ पुलिसकर्मी आपस में बतिया रहे थे कि “कप्तान का भरोसा एक उपकप्तान पर कुछ ज्यादा ही है।” वैसे तो जबलपुर में पांच उपकप्तान पदस्थ हैं और सभी के अपने-अपने कार्यक्षेत्र तय हैं, लेकिन बातचीत के दौरान पुलिसकर्मियों ने इशारों-इशारों में कह दिया कि “एक उपकप्तान को मन ही मन छोटा कप्तान मान लिया जाए।” अब देखना यह है कि उक्त उपकप्तान ‘छोटे कप्तान’ के रूप में कब तक मशहूर रहते हैं। वहीं, पूरे थानों पर नजर रखने वाले साहब छोटे उपकप्तान के बढ़ते रुबाब से परेशान भी नजर आ रहे हैं।
यह नींद है कि पीछा नहीं छोड़ती

कभी शहर कोतवाल के रूप में चर्चित थाने में पदस्थ एक साहब मुस्तैदी के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, थाना एस्कॉर्ट के सिपाही गश्त के दौरान चर्चा करते सुने गए कि “अपने साहब को कोई बीमारी तो नहीं हो गई?” गश्त के समय नींद के झोंके आना सामान्य बात है, लेकिन बताया जाता है कि साहब को दिन में भी नींद परेशान कर देती है। अब इस नींद के पीछे का राज क्या है, यह तो साहब ही जानें; पर स्वास्थ्य की दृष्टि से यह स्थिति ठीक नहीं मानी जा रही है।
उपकप्तान में कप्तान का रुबाब, पर हौसले की कमी

शहर के एक उपकप्तान, जो सीधी भर्ती से सेवा में आए हैं, उनका अंदाज अभी से कप्तान जैसा बताया जाता है। क्राइम मीटिंग हो या अधीनस्थों से बातचीत—उनका तरीका ऐसा होता है मानो वही कप्तान हों। किंतु जब-जब कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी में उन्हें आगे किया गया, तब-तब कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि चर्चा शुरू हो गई—“यदि कप्तान होते तो क्या करते?” हाल ही में एक राजनीतिक दल के लोग कंट्रोल रूम में घुस गए, जिसके बाद विभागीय गलियारों में फुसफुसाहट सुनाई दी कि “कप्तान न होकर भी कप्तानी का रौब तो दिखता है, पर जब सच में कप्तान बनेंगे, तब जिला कैसे संभालेंगे?”
रेडियो शाखा में ‘हाय-तौबा’

एसपी कार्यालय प्रांगण में स्थित रेडियो शाखा में इन दिनों गोपनीय रूप से ‘हाय-तौबा’ मची हुई है। हुआ यूं कि पहले जो साहब पदस्थ थे, वे अधीनस्थों से गुटखा मांगकर भी खा लेते थे। गुटखा पसंद करने वाले साहब तो चले गए, अब नए साहब ने कार्यभार संभाला है। पुराने साहब के व्यवहार के अभ्यस्त कर्मचारियों की जमीन तब खिसक गई, जब नए साहब ने प्रत्येक कर्मचारी के पास अलग-अलग वायरलेस सेट रखवा दिया। अब हर गतिविधि उसी से संचालित होती है—कौन, कब और कहां जा रहा है, इस पर सीधी नजर रखी जा रही है। वायरलेस कर्मचारी आपस में कहते सुने गए, “आखिर हमें वह गाना कब गाने मिलेगा—‘चले गए थानेदार, अब डर काहे का।’”
‘घर से चल रहा है थाना’

संगमरमर वादियों के लिए चर्चित क्षेत्र के एक थाने की चर्चा भी आम है। यहां के थाना प्रभारी फरियादियों से बहुत कम मिल पाते हैं। मोबाइल और सेट पर सक्रिय रहने वाले साहब थाने की कुर्सी पर बैठने से कतराते हैं। चूंकि यह ग्रामीण थाना है और परिसर में ही उनका शासकीय निवास भी स्थित है, इसलिए क्षेत्र में यह चर्चा है कि “थाना तो घर से ही संचालित हो रहा था।”







