भोपाल

चीता प्रोजेक्ट से बदली कूनो की तस्वीर – बिग कैट्स से लेकर दुर्लभ वन्यजीवों तक बढ़ा कुनबा

चीता प्रोजेक्ट से बदली कूनो की तस्वीर
– बिग कैट्स से लेकर दुर्लभ वन्यजीवों तक बढ़ा कुनबा

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भोपाल, यश भारत । कूनो नेशनल पार्क में शुरू किया गया चीता संरक्षण अभियान अब केवल चीतों तक सीमित नहीं रहा। इस परियोजना ने पूरे जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को नई मजबूती दी है। चीता संरक्षण के लिए बनाई गई कड़ी निगरानी व्यवस्था, आधुनिक मॉनिटरिंग सिस्टम, शिकार पर नियंत्रण, मानव हस्तक्षेप में कमी और लैंडस्केप आधारित संरक्षण रणनीति का सकारात्मक असर अब कूनो के लगभग हर वन्यजीव वर्ग पर दिखाई देने लगा है। बड़े मांसाहारी जीवों से लेकर उनके प्रमुख शिकार और कई दुर्लभ प्रजातियों तक की उपस्थिति और संख्या में सुधार दर्ज किया गया है।
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी एल कृष्णमूर्ति के अनुसार, कूनो में चीता संरक्षण के लिए अपनाए गए संरक्षण मॉडल ने पूरे जंगल को लाभ पहुंचाया है। नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग, प्रशिक्षित वन अमले की तैनाती और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के कारण अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण हुआ है। इससे वन्यजीवों को सुरक्षित वातावरण मिला और उनका प्राकृतिक व्यवहार तथा प्रजनन भी बेहतर हुआ।
बिग कैट्स के लिए मजबूत हुआ आवास
कूनो अब देश के उन चुनिंदा संरक्षित क्षेत्रों में शामिल हो गया है, जहां एक साथ कई बड़े मांसाहारी जीवों की मजबूत मौजूदगी देखने को मिल रही है। चीतों के साथ तेंदुओं की अच्छी आबादी पहले से मौजूद है, जबकि जंगल में अन्य शिकारी जीव भी सुरक्षित माहौल में विचरण कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जंगल में शीर्ष शिकारी प्रजातियों की मौजूदगी उस क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत होती है।

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शिकार प्रजातियों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी
केवल शिकारी ही नहीं, बल्कि उनके भोजन का आधार बनने वाली शिकार प्रजातियों में भी वृद्धि हुई है। चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा और जंगली सूअर जैसी प्रजातियों की उपलब्धता बेहतर होने से बड़े मांसाहारी जीवों के लिए प्राकृतिक शिकार का आधार मजबूत हुआ है। इससे वन्यजीवों का जंगल के बाहर जाने का जोखिम भी कम होता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना घटती है।
दुर्लभ प्रजातियों की वापसी बनी बड़ी उपलब्धि
कूनो के संरक्षण मॉडल की सबसे बड़ी सफलता यह मानी जा रही है कि यहां ऐसी प्रजातियां भी रिकॉर्ड की गई हैं, जिनकी मौजूदगी लंबे समय से दर्ज नहीं हुई थी या जो अत्यंत दुर्लभ मानी जाती हैं। इनमें काराकल, जंगली कुत्ता (ढोल), भेड़िया और दुर्लभ फॉरेस्ट आउलेट जैसी प्रजातियां शामिल हैं। इनका रिकॉर्ड होना इस बात का संकेत है कि जंगल का प्राकृतिक संतुलन मजबूत हो रहा है और आवास की गुणवत्ता में सुधार आया है।
‘लैंडस्केप कंजर्वेशन’ मॉडल बना सफलता की कुंजी
विशेषज्ञों के अनुसार, कूनो में केवल एक प्रजाति पर नहीं, बल्कि पूरे लैंडस्केप को केंद्र में रखकर संरक्षण किया गया। जंगल, घास के मैदान, जल स्रोत, वन्यजीव गलियारे और आसपास के क्षेत्रों को जोड़कर संरक्षण की रणनीति बनाई गई। इसी कारण इसका लाभ केवल चीतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे वन्यजीव तंत्र को मिला।
देश के लिए बन रहा नया मॉडल
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि कूनो का अनुभव बताता है कि यदि संरक्षण वैज्ञानिक योजना, मजबूत निगरानी और स्थानीय सहभागिता के साथ किया जाए तो एक प्रजाति के लिए शुरू की गई परियोजना पूरे जंगल की जैव विविधता को समृद्ध कर सकती है। यही कारण है कि अब कूनो को केवल चीता प्रोजेक्ट के रूप में नहीं, बल्कि समग्र वन्यजीव संरक्षण के सफल भारतीय मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

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