कैसी कही – फितरती : फर्जी अफसर का जलवा, असली अफसरों की शामत

कैसी कही – फितरती : फर्जी अफसर का जलवा, असली अफसरों की शामत
भोपाल, यश भारत । मंत्रालय में इन दिनों पहचान बताने से ज्यादा पहचान जांचने पर जोर है। फर्जी अधिकारी बनकर रुतबा जमाने की खबर सामने आने के बाद असली अफसरों की भी मुश्किल बढ़ गई है। बताया जाता है कि संबंधित महिला कई बड़े अधिकारियों से अपनी नजदीकी का हवाला देकर प्रभाव जमाती थी। अब हालात ऐसे हैं कि नाम सुनकर दरवाजे खुलने के बजाय परिचय पत्र मांगा जा रहा है। मंत्रालय में चर्चा यह भी है कि मैडम का नेटवर्क कितना बड़ा था और किन-किन नामों के सहारे रसूख दिखाया गया। जांच आगे बढ़ेगी तो कई नए किस्से सामने आने की उम्मीद है।
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कुर्सी की दौड़ में अफसरों ने कसी कमर
मंत्रालय में सरकारी कामकाज अपनी जगह है और पसंदीदा कुर्सी की तलाश अपनी जगह। तबादलों की सुगबुगाहट क्या शुरू हुई, कई अफसरों ने संपर्कों की डायरी झाड़-पोंछकर फिर से सक्रिय कर ली है। किसी की नजर राजधानी पर है, किसी को बड़ा जिला चाहिए और किसी की पसंद ऐसा विभाग है, जहां पद के साथ सुविधाएं भी मिलें। कहीं फोन घूम रहे हैं, कहीं मुलाकातों का दौर चल रहा है और कहीं साहब से बात हो गई है, का भरोसा दिलाया जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला सरकार को ही करना है, लेकिन दावेदारों ने अपनी तरफ से तैयारी पूरी कर रखी है। माहौल देखकर लगता है कि तबादला आदेश बाद में निकलेगा, कुर्सी की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी है।
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वारंट आया तो अफसरों की नींद उड़ी
अब तक अदालत की तारीख को सरकारी कैलेंडर की सामान्य तारीख समझने वालों की नींद वारंट जारी होते ही उड़ गई। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद पेशी पर नहीं पहुंचने वाले अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने की खबर से मंत्रालय में हलचल मच गई। अदालत की तारीख कोई विभागीय बैठक तो है नहीं कि व्यस्तता बताकर अगली तारीख मांग ली जाए। अब 21 सितंबर को पेशी तय है और अधिकारियों को अदालत तक पहुंचाने की जिम्मेदारी पुलिस पर है। लिहाजा मंत्रालय में इन दिनों फाइलों से ज्यादा अदालत की तारीख चर्चा में है।
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साहब बनने के लिए लगवा रहे फोन
मंत्रालय में पदस्थ एक आईएएस अधिकारी इन दिनों फील्ड पोस्टिंग के लिए काफी उत्सुक बताए जा रहे हैं। इच्छा कलेक्टर बनने की है और इसके लिए प्रयास भी जारी हैं। चर्चा है कि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के एक प्रभावशाली नेता की ओर से भी उनके लिए सिफारिश की गई है, लेकिन फिलहाल बात बनती नजर नहीं आ रही। साहब को किसी ने शायद समझा दिया है कि मंत्रालय में बहुत अच्छा काम कर लिया तो सरकार उन्हें बाहर जाने ही नहीं देगी। लिहाजा काम की रफ्तार भी नाप-तौलकर रखने की चर्चा है। मगर यह रणनीति ऊपर तक पहुंच गई तो मामला उलटा पड़ सकता है। बताया जाता है कि अधिकारी पहले ग्वालियर-चंबल संभाग के एक जिले में कलेक्टर रह चुके हैं।






