कटनी में भी दतिया जैसे हालात, 7 साल में यहां भी एक नेता के इर्द गिर्द सिमटी भाजपा, समय रहते प्रदेश नेतृत्व को होना होगा अलर्ट

कटनी, यशभारत। क्या कटनी भी दूसरा दतिया बन चुका है। क्या भाजपा संगठन को यहां ठीक वैसा ही जोखिम है, जैसा उसे दतिया के उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा की टिकट काटने के बाद उठाना पड़ा ? दतिया के समूचे भाजपा संगठन को प्रदेश नेतृत्व द्वारा भंग कर दिये जाने के बाद से यह सवाल कटनी के राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी ने किसी चुनाव में पराजय के बाद पहली बार इतनी कड़ी कार्यवाही कर समूचे प्रदेश में यह संदेश देने की कोशिश की है कि क्षत्रपों के सहारे चलने वाली जिला इकाइयां किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। दतिया में पार्टी से यही गलती हुई, कि जिला कार्यकारिणी, मंडलों से लेकर मोर्चों और प्रकोष्ठों में नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को काबिज करा दिया गया, नतीजा यह हुआ कि जब उनका टिकट काटा गया तो वहां के कार्यकर्ताओं ने चुनाव में पार्टी का खेल बिगाड़ दिया। कटनी में भी कमोवेश ऐसे ही हालातों से भाजपा गुजर रही है, जहां एक नेता के इर्द गिर्द पूरी पार्टी सिमटकर रह गई है।
दतिया की हार ने भारतीय जनता पार्टी में हलचल मचा दी। कल राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पर चली बैठक में पराजय की समीक्षा के बाद देर रात सांगठनिक स्तर पर बड़ा एक्शन लेते हुए दतिया जिले की भाजपा के सभी जिला पदाधिकारियों, मंडलों, मोर्चों, प्रकोष्ठों और अन्य प्रकल्पों में पदासीन नेताओं की छुट्टी कर दी गई। किसी चुनाव में मिली पराजय के बाद शायद एमपी में पार्टी की यह पहली ऐसी बड़ी सर्जरी है। हो सकता है पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ भी दिल्ली से कोई बड़ी कार्यवाही हो जाए, लेकिन पार्टी के सामने यह मंथन का विषय अवश्य है कि किसी जिले में किसी एक नेता के सहारे पूरा संगठन क्यों छोड़ दिया गया। जिला कार्यकारिणी से लेकर मोर्चों और प्रकोष्ठों में क्यों एक ही नेता के समर्थकों का वर्चस्व होने दिया गया। इस चुनाव का सच यही है कि दतिया में भाजपा से कहीं बड़ी लकीर नरोत्तम मिश्रा के समर्थक खींच चुके थे, और जब उनके नेता की टिकट कटी तो वे आहत हो गए। आंतरिक विरोध इतना बढ़ा कि चुनाव में उसे संभाला नहीं जा सका और अंततः कांग्रेस की जीत की पटकथा लिख दी गई।
कटनी में भी यही हालात
यशभारत से बातचीत में अनेक वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने ही माना कि कटनी के भाजपा संगठन में भी दतिया जैसी परिस्थितियां पैदा हो चुकी है। संसदीय क्षेत्र का चुनाव लड़कर दिल्ली पहुंचने वाले एक नेता के इर्द गिर्द पिछले 7 साल में पूरी पार्टी सिमट चुकी है। समर्पित कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज कर जिलाध्यक्ष को लगातार दूसरी बार इसलिए काबिज कराया गया क्योंकि वे उनके खास समर्थक हैं। यही हाल जिला पदाधिकारियों से लेकर मंडल, मोर्चों और प्रकोष्ठों का है। अब तो कार्यकर्ता खुलकर कहने लगे है कि कटनी की भाजपा में यदि पद चाहिए तो इस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का समर्थक बनना पड़ेगा। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को समय रहते प्रदेश के अन्य जिलों के संगठनों की मौजूदा परिस्थितियों की भी बारीकी से जानकारी लेना चाहिए, खासकर कटनी की। कही ऐसा न हो आने वाले चुनावों में पार्टी को यहां बड़ा नुकसान उठाना पड़े। गौरतलब है कि कटनी के एक विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस यह गलती कर चुकी है, जिसका खामियाजा उसे आज तक भोगना पड़ रहा है।
क्या कहते हैं नेता
अपना नाम न छापने की शर्त पर कुछ भाजपा नेताओं ने यशभारत से कहा कि आगामी ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, नगरीय निकाय,विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों को दृष्टिगत रखते हुए पार्टी को सभी जिलों की व्यापक एवं निष्पक्ष संगठनात्मक समीक्षा समय रहते करानी चाहिए। यदि किसी भी जिले में यह पाया जाता है कि जिला कार्यकारिणी किसी एक प्रभावशाली नेता, गुट या व्यक्ति के दबाव अथवा प्रभाव में गठित की गई है, जिससे संगठन की निष्पक्षता, कार्यकर्ताओं की भागीदारी और चुनावी क्षमता प्रभावित हो रही है, तो ऐसी जिला कार्यकारिणी को चुनाव से पूर्व ही भंग कर देना चाहिए।






