सरकारी दावों का निकला ‘धुआं’: छात्रावासों में रसोई गैस गुम, घुट रहा मासूमों का भविष्य

यशभारत डिंडोरी । बच्चों को धुएं से मुक्त वातावरण में स्वच्छ और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार ने मध्याह्न भोजन (मिड डे मील) योजना के तहत स्कूलों और छात्रावासों में गैस चूल्हों की व्यवस्था की थी। लेकिन डिंडौरी जिले के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में यह व्यवस्था अब केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित दिखाई दे रही है। जमीनी पड़ताल में सामने आया कि जिले के अधिकांश स्कूलों और छात्रावासों में आज भी भोजन लकड़ी के चूल्हों पर पकाया जा रहा है। गैस चूल्हे और सिलेंडर या तो वर्षों से उपयोग में नहीं हैं या फिर महंगे रिफिल और दूरस्थ क्षेत्रों तक आपूर्ति नहीं होने के कारण बेकार पड़े हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान यह भी सामने आया कि केवल रसोई व्यवस्था ही नहीं, बल्कि कई स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था भी बदहाल है। कहीं भवन जर्जर हैं तो कहीं छतें इतनी क्षतिग्रस्त हैं कि बच्चों को कक्षाओं के बजाय बरामदे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। ऐसे में शिक्षा और पोषण दोनों योजनाओं की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है।
पड़ताल में क्या मिला?
विकासखंड करंजिया के ठाडपाथर और पंडरीपानी बैगाचक गांव के विद्यालयों में कक्षाओं की छतें जर्जर मिलीं। बारिश के मौसम में कमरों में पानी टपकने और दुर्घटना की आशंका के कारण विद्यार्थियों को खुले बरामदे में बैठाकर पढ़ाया जा रहा था।
इसी दौरान ग्राम पंचायत उमरिया के बालक आश्रम ददरगांव में भोजन गैस चूल्हे के बजाय लकड़ी के चूल्हे पर बनता मिला। रसोई कर्मचारियों ने बताया कि गैस सिलेंडर नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हो पाता और रिफिल की लागत भी अधिक होने के कारण लकड़ी का सहारा लेना पड़ता है।
धुएं में पक रहा बच्चों का भोजन
सरकार स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने और महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा की बात करती है, लेकिन हकीकत यह है कि रसोईयों को रोजाना घंटों धुएं के बीच खड़े होकर भोजन बनाना पड़ता है। इससे आंखों और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, लकड़ी की लगातार खपत पर्यावरण संरक्षण की मंशा पर भी सवाल खड़े करती है।
रसोईघर भी बदहाल
जिले के कई स्कूलों और छात्रावासों के रसोईघर भी खस्ताहाल मिले। कहीं छत से पानी टपक रहा है, कहीं दीवारों में दरारें हैं और कहीं पर्याप्त सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे हालात में बच्चों के लिए स्वच्छ भोजन तैयार करना आसान नहीं है।
सरकारी योजना का उद्देश्य अधूरा
मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य केवल बच्चों को भोजन देना नहीं, बल्कि उन्हें पौष्टिक, स्वच्छ और सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना भी है। लेकिन जब भोजन लकड़ी के धुएं के बीच जर्जर रसोईघरों में तैयार हो और स्कूल भवन भी असुरक्षित हों, तो योजना का मूल उद्देश्य अधूरा नजर आता है।
प्रशासन के सामने बड़े सवाल
यदि स्कूलों और छात्रावासों में गैस कनेक्शन दिए गए हैं, तो उनका उपयोग क्यों नहीं हो रहा?
क्या नियमित रूप से गैस सिलेंडर रिफिल कराने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाता है?
जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत कब होगी?
बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?







