जर्जर स्कूल भवनों में बैठने को मजबूर हजारों बच्चे, बारिश में कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
मौत के साए में पढ़ाई, कब जागेगा सिस्टम?,फाइलों में कैद हैं मरम्मत और नए भवनों के प्रस्ताव

जबलपुर, यशभारत। ग्रीष्मकालीन अवकाश समाप्त होने के बाद आज से नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो चुकी है। स्कूलों में बच्चों की चहल-पहल लौट आई है, लेकिन प्रदेश के हजारों छात्र आज भी मौत के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जिले के कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां जर्जर और कंडम घोषित भवनों में कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। बारिश का मौसम शुरू होते ही इन भवनों की खस्ताहाल स्थिति ने अभिभावकों और शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। कहीं छतों से पानी टपक रहा है तो कहीं दीवारों का प्लास्टर गिर रहा है। कई भवनों में दरारें इतनी गहरी हैं कि किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद बच्चों को इन्हीं कमरों में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है।
प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग और लोक निर्माण विभाग द्वारा समय-समय पर जर्जर भवनों का सर्वे कराया जाता रहा है। कई भवनों को मरम्मत योग्य और कई को अत्यंत जर्जर घोषित कर नए भवन निर्माण अथवा ध्वस्तीकरण के प्रस्ताव भी भेजे गए, लेकिन सरकारी मशीनरी की धीमी रफ्तार और बजट की कमी के कारण अधिकांश मामलों में फाइलें आगे नहीं बढ़ सकीं। परिणाम यह है कि नए सत्र की शुरुआत के बावजूद बच्चे असुरक्षित भवनों में पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं।
एक कमरे में कई कक्षाएं, बरामदों में लग रही पढ़ाई
कई स्कूलों में हालात इतने खराब हैं कि जर्जर कमरों को बंद कर दिया गया है। ऐसे में एक ही कमरे में दो से तीन कक्षाओं के विद्यार्थियों को बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। कहीं बरामदों में कक्षाएं लग रही हैं तो कहीं पेड़ों की छांव और खुले मैदान में बच्चों को बैठना पड़ रहा है। बारिश होने पर स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। कई स्कूलों में बच्चों को घंटों खड़े रहकर समय बिताना पड़ता है क्योंकि सुरक्षित कमरे उपलब्ध नहीं हैं।
मरम्मत के नाम पर केवल कागजी कवायद
शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की ओर से हर वर्ष मरम्मत और नए भवन निर्माण के प्रस्ताव भेजे जाते हैं, लेकिन धरातल पर तस्वीर नहीं बदल रही। कई स्कूलों को लेकर लोक निर्माण विभाग से तकनीकी रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने से प्रस्ताव लंबित पड़े हैं। जहां स्वीकृति मिली भी, वहां बजट जारी नहीं हो पाया। नतीजतन, बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा मामला सरकारी फाइलों में ही दबकर रह गया है।
मानसून ने बढ़ाई चिंता, अभिभावकों में डर
मानसून की दस्तक के साथ ही अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। पिछले वर्षों में प्रदेश के कई हिस्सों में स्कूल भवनों की छत और दीवारें गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद सबक लेने के बजाय जिम्मेदार विभागों की उदासीनता जारी है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन उनकी जान जोखिम में डालकर नहीं। यदि समय रहते जर्जर भवनों की मरम्मत या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई तो किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।
बड़ा सवाल
प्रदेश सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और स्मार्ट क्लास की बात कर रही है, लेकिन जब बच्चों को सुरक्षित छत तक नसीब नहीं हो रही तो ये तमाम दावे खोखले नजर आते हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही जिम्मेदार विभागों की नींद खुलेगी? आखिर कब तक प्रदेश के बच्चे जर्जर भवनों में अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर रहेंगे?








