जबलपुर के संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ कथित डॉक्टर ने 10 लाख में खरीदी थी पहली जाली डिग्री, जांच में खुला प्रदेशव्यापी नेटवर्क,ग्वालियर में बनती थीं एमबीबीएस की फर्जी डिग्रियां

जबलपुर। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। सरकारी सिस्टम की आंखों में धूल झोंककर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले फर्जी डॉक्टरों के नेटवर्क का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों की पड़ताल में सामने आया है कि ग्वालियर में बाकायदा एमबीबीएस की फर्जी डिग्रियां तैयार की जाती थीं और उन्हें लाखों रुपये में बेचकर लोगों को डॉक्टर बनाया जा रहा था।
इस सनसनीखेज मामले में जबलपुर का नाम सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है। पुलिस की जांच अब प्रदेश के कई जिलों तक पहुंच चुकी है और आशंका जताई जा रही है कि कई अस्पतालों में फर्जी डॉक्टर वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं।
10 लाख में खरीदी गई थी पहली फर्जी डिग्री
पुलिस पूछताछ में यह खुलासा हुआ है कि जबलपुर के संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ कथित डॉक्टर अजय मौर्य ने सबसे पहले 10 लाख रुपये देकर फर्जी एमबीबीएस डिग्री खरीदी थी। इसी जाली दस्तावेज के आधार पर उसने स्वास्थ्य विभाग में नौकरी हासिल की और करीब दो साल तक मरीजों का इलाज करता रहा।
जांच अधिकारियों का कहना है कि आरोपी ने खुद स्वीकार किया है कि उसने भारी रकम देकर डिग्री खरीदी थी। यही नहीं, उसके जरिए कई अन्य लोगों को भी इस नेटवर्क से जोड़ा गया।
8 से 10 लाख रुपये में होता था डिग्रियों का सौदा
पुलिस सूत्रों के मुताबिक यह पूरा रैकेट बेहद शातिर तरीके से संचालित किया जा रहा था। फर्जी अंकसूचियां, रजिस्ट्रेशन दस्तावेज और एमबीबीएस डिग्रियां तैयार कर जरूरतमंद लोगों को 8 से 10 लाख रुपये में बेचा जाता था।गिरोह पहले ऐसे लोगों की तलाश करता था जो कम समय मेंडॉक्टर बनकर नौकरी हासिल करना चाहते थे। इसके बाद उन्हें फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाते थे। जांच में यह भी सामने आया है कि कई सरकारी संस्थानों में सत्यापन प्रक्रिया की लापरवाही के चलते ऐसे लोग आसानी से नौकरी पाने में सफल हो गए।
ग्वालियर का असली एमबीबीएस डॉक्टर निकला मास्टरमाइंड
जांच में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि इस पूरे खेल के पीछे ग्वालियर का एक असली एमबीबीएस डॉक्टर ही मास्टरमाइंड बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार वही फर्जी डिग्रियां तैयार करवाने और नेटवर्क संचालित करने का काम करता था।बताया जा रहा है कि भोपाल निवासी संदीप नामक आरोपी के साथ मिलकर उसने प्रदेशभर में यह गिरोह खड़ा किया। फिलहाल पुलिस मुख्य आरोपी डॉक्टर की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
अब तक 6 आरोपी गिरफ्तार, कई और नाम आने की आशंका
इस मामले में पुलिस अब तक 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। जांच एजेंसियों का मानना है कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के बाद कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।
संभावना जताई जा रही है कि प्रदेश के सरकारी और निजी अस्पतालों में कार्यरत कुछ अन्य डॉक्टर भी जांच के घेरे में आ सकते हैं। पुलिस अब फर्जी दस्तावेजों के जरिए नौकरी पाने वाले लोगों की सूची तैयार कर रही है।
दमोह से खुला था पूरा फर्जीवाड़ा
इस पूरे रैकेट का भंडाफोड़ सबसे पहले दमोह जिले में हुआ था। स्वास्थ्य विभाग की शिकायत के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो फर्जी डॉक्टरों को पकड़ा था।इसके बाद जब पूछताछ आगे बढ़ी तो मामला भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर तक जा पहुंचा। जांच की परतें खुलती गईं और सामने आया कि यह कोई छोटा फर्जीवाड़ा नहीं बल्कि प्रदेश स्तर पर फैला संगठित नेटवर्क है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आखिर बिना सही सत्यापन के फर्जी डिग्रीधारी लोग सरकारी सिस्टम तक कैसे पहुंच गए?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते यह खुलासा नहीं होता तो ऐसे फर्जी डॉक्टर न जाने कितने मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करते रहते। फिलहाल पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों पूरे मामले की गहराई से जांच में जुटे हुए हैं।







