जबलपुरमध्य प्रदेश

मेरा यादगार केस – जेल अधीक्षक की आंखों को नम कर गया वह लम्हा—जब मां की अधूरी ममता जाली के पार ही रह गई

संवेदनाओं से संवारी व्यवस्था—जेल सुधार, पुनर्वास और मानवीय दृष्टिकोण की एक मिसाल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सेंट्रल जेल के वरिष्ठ जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर का यादगार लम्हा

जबलपुर, यश भारत – छह महीने की लंबी प्रतीक्षा के बाद एक मां अपने बेटे से मिलने जेल पहुंची थी। पैरों की गंभीर बीमारी से जूझते हुए वह किसी तरह वहां तक पहुंची, लेकिन जब मुलाकात का समय आया तो जाली के आर-पार बनी दूरी और सीमित समय उसकी ममता पर भारी पड़ गए। वह बहुत कुछ कहना चाहती थी, अपने बेटे से दिल की बात साझा करना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आकर रह गए और समय चुपचाप बीत गया। मुलाकात समाप्त हो गई, पर एक मां का मन खाली रह गया—अपनी ही संतान से वह वह सब न कह सकी, जो छह महीनों से उसके भीतर उमड़ रहा था।

03 4

यही वह मार्मिक क्षण था, जिसने वरिष्ठ जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर के मन को गहराई तक झकझोर दिया। जब उस मां ने अपनी पीड़ा उन्हें बताई, तो उन्होंने इस व्यवस्था की संवेदनहीनता को करीब से महसूस किया। इस अनुभव ने उनकी सोच को नई दिशा दी और उन्होंने निर्णय लिया कि बुजुर्गों व दिव्यांगजनों के लिए मुलाकात की व्यवस्था अधिक सहज और मानवीय बनाई जाए। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ में अपने कार्यकाल के दौरान जेल के भीतर ही विशेष मुलाकात व्यवस्था शुरू करवाई, ताकि कोई भी मां अपने बेटे से मिलकर अधूरी न लौटे। ‘यश भारत’ के ‘मेरा यादगार केस ’ स्तंभ में वरिष्ठ जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने इस घटना को अपने जीवन के सबसे विशेष और भावनात्मक अनुभव के रूप में साझा किया, जिसे वे आज भी एक सीख के रूप में याद करते हैं।

घटना जिसने बदल दी सोच, मुलाकात व्यवस्था में मानवीय सुधार की शुरुआत

04 5

जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने अपने लगभग 30 वर्षों के सेवा अनुभव को साझा करते हुए बताया कि उनके कार्यकाल में कई यादगार घटनाएं रही हैं, जिनमें से एक ने उनके कार्य करने के दृष्टिकोण को बदल दिया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 से 2007 के बीच छत्तीसगढ़ के दुर्ग मे पदस्थ रहते हुए उन्होंने देखा कि जेलों में बंदियों और उनके परिजनों के बीच मुलाकात की व्यवस्था बेहद सीमित और असुविधाजनक थी। एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि दोपहर के समय एक महिला अपने बंदी बेटे से मिलने के लिए घंटों से बैठी थी, लेकिन शारीरिक अस्वस्थता के कारण वह खिड़की तक पहुंचकर ठीक से बात नहीं कर पा रही थी और केवल औपचारिक रूप से उसकी मुलाकात दर्ज हो पाई। इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने महसूस किया कि बुजुर्ग, दिव्यांग या अस्वस्थ परिजनों के लिए जेलों में विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि ऐसे लोगों के लिए भीतर ही समुचित मुलाकात की व्यवस्था की जाए, ताकि वे अपने परिजनों से सहज रूप से मिल सकें। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में बंदियों की संख्या क्षमता से अधिक होने के कारण व्यवस्थाओं पर दबाव रहता है, हालांकि कई प्रक्रियाएं डिजिटल होने से रजिस्ट्रेशन और मुलाकात का समय प्रबंधन बेहतर हुआ है। इसके बावजूद बड़े परिसर और बंदियों तक पहुंचने में समय लगना जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं, जिन्हें सुधारने के प्रयास लगातार जारी हैं।

“स्थानीय संस्कृति का सम्मान, भोजन में बदलाव से बढ़ा मनोबल”

जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने अपने जगदलपुर कार्यकाल को याद करते हुए बताया कि उस समय क्षेत्र आदिवासी बहुल था, जहां की खान-पान संस्कृति सामान्य व्यवस्थाओं से भिन्न थी। उन्होंने कहा कि जेलों में विशेष अवसरों पर पारंपरिक रूप से पूरी-सब्जी और मिठाई दी जाती थी, लेकिन स्थानीय आदिवासी बंदी इसे पसंद नहीं करते थे। इस स्थिति को समझने के लिए उन्होंने क्षेत्र के लोगों से संवाद किया, जिसके बाद पता चला कि वे चावल से बने एक पारंपरिक व्यंजन को दूसरे दिन चटनी के साथ खाना अधिक पसंद करते हैं। इसके बाद उन्होंने जेल में उसी अनुरूप भोजन व्यवस्था लागू कराई। उन्होंने बताया कि इस छोटे से बदलाव से बंदियों का मनोबल बढ़ा और जेल में समन्वय व कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

“काउंसलिंग और हेल्थ कैंप, सुधार के साथ स्वास्थ्य पर भी फोकस”

वरिष्ठ अधीक्षक के अनुसार जेल में नव-प्रवेशित बंदियों और स्टाफ की नियमित काउंसलिंग व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है। उन्होंने कहा कि जहां कुछ कैदी सहज रूप से अपराध कर जेल आते हैं, वहीं कई प्रथम बार अपराध करने वाले ऐसे होते हैं जो पारिवारिक या मानसिक परिस्थितियों के कारण अपराध की ओर बढ़ते हैं, इसलिए उनके लिए विशेष काउंसलिंग आवश्यक होती है। निर्धारित दिनों में डॉक्टरों और विशेषज्ञ काउंसलरों द्वारा काउंसलिंग कराई जाती है, जिसमें नशे के आदी व्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके साथ ही जेल में समय-समय पर बंदियों और स्टाफ के लिए हेल्थ कैंप भी आयोजित किए जाते हैं, जिससे उनके शारीरिक स्वास्थ्य की नियमित जांच और उपचार सुनिश्चित हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि स्टाफ की काउंसलिंग उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके सकारात्मक मनोभाव और मानसिक संतुलन से ही पूरे तंत्र का संचालन सुचारू रूप से संभव होता है।

“स्किल डेवलपमेंट से नई राह, जेल से रोजगार तक का सफर”

सजा प्राप्त बंदियों के पुनर्वास के लिए उनकी पृष्ठभूमि और रुचियों का आकलन कर उन्हें उसी अनुरूप कार्यों में लगाया जाता है, जैसे बढ़ईगिरी, फिटर या फार्मेसी से जुड़े कार्य। इसके साथ ही तोमर बताते है कि जेल में आईटीआई, होटल मैनेजमेंट सहित विभिन्न स्किल डेवलपमेंट कोर्स संचालित किए जा रहे हैं, ताकि बंदी नई दिशा में आगे बढ़ सकें। उन्होंने एक प्रेरक अनुभव साझा करते हुए बताया कि कुछ बंदी जेल से रिहा होने के बाद उनसे मिले और उन्होंने बताया कि जेल में सीखी गई पेंटिंग और ड्राइंग आज उनकी आजीविका का साधन बन चुकी है। ऐसे अनुभव न केवल सकारात्मक परिवर्तन का संकेत देते हैं, बल्कि यह भी साबित करते हैं कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर व्यक्ति अपराध की दुनिया से दूर होकर सम्मानजनक जीवन जी सकता है।

“भ्रांतियों पर सख्ती, अनियमितताओं पर कार्रवाई—समझौता नहीं”

जेल व्यवस्थाओं को लेकर फैली भ्रांतियों पर स्पष्ट करते हुए अखिलेश तोमर ने कहा कि जहां व्यवस्थाएं होती हैं, वहां कुछ कमियां स्वाभाविक रूप से हो सकती हैं, क्योंकि यह एक मानवीय तंत्र है। हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि शिकायतों पर कार्रवाई न हो, तब प्रश्न उठना उचित है। उन्होंने बताया कि बीते वर्ष प्राप्त शिकायतों के आधार पर 12 कर्मचारियों को टर्मिनेट किया , जो इस बात का प्रमाण है कि अनियमितताओं पर सख्त कदम उठाए जाते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगे भी ऐसी कार्रवाई लगातार जारी रहेगी और इसमें किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

“युवाओं को संदेश, अपराध और नशे से दूरी ही सुरक्षित भविष्य की कुंजी”

युवाओं को संदेश देते हुए जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने कहा कि उन्हें अपराध और नशे से दूर रहना चाहिए, क्योंकि एक बार यदि कोई युवा अपराध के दलदल में फंस जाता है तो उसका करियर ही नहीं, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित हो जाता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में नशा युवाओं के सामने एक गंभीर सामाजिक समस्या बनकर उभरा है, जो उन्हें गलत रास्ते की ओर धकेलता है। इसलिए आवश्यक है कि युवा सही दिशा चुनें, अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें और ऐसे किसी भी प्रभाव से दूर रहें जो उनके भविष्य को नुकसान पहुंचा सकता है।

02 4

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button