आपातकाल के 50 साल: मीसाबंदियों ने सुनाई आपबीती, ‘आफतकाल’ के अनुभव साझा किए

पनागर: 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल की घोषणा को आज 50 साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर, आपातकाल के दौरान जेल में रहे ‘मीसाबंदियों’ ने अपनी आपबीती साझा की और उस दौर को ‘आफतकाल’ करार दिया।
एक मीसाबंदी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके लिए यह आपातकाल नहीं, बल्कि ‘आफतकाल’ था। उन्होंने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 12 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया गया था, जिसमें उन्हें 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इससे इंदिरा गांधी बौखला गई थीं और विपक्ष द्वारा उनके इस्तीफे का दबाव बनाया जाने लगा था। इसी दौरान, 12 जून को ही गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और संयुक्त मोर्चे को जीत मिली।
मीसाबंदी ने आरोप लगाया कि “कुर्सी के मोह” में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस समय के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगवा दिया। रातोंरात विपक्ष के अधिकांश नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। इतना ही नहीं, विरोधियों को मारपीट कर प्रताड़ित किया गया और लोगों का जीना मुश्किल हो गया था।
आपातकाल के व्यक्तिगत अनुभव:
एक मीसाबंदी ने 26 जून 1975 की सुबह का अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, “मैं पनागर आया और थाने के आगे वाले स्टैंड पर टैक्सी से उतरने के बाद होटल में पेपर पढ़ने के लिए उठाया ही था कि दो पुलिस वाले आ गए और बोले, ‘नेता, तुम इधर से जल्दी भाग जाओ।’ वे पुलिस वाले मेरे परिचित के थे। उन्होंने कहा, ‘नहीं तो तुम्हें बंद होना पड़ेगा क्योंकि पूरन मंधान, डॉक्टर श्रीपाल जी, काशी सराफ को पुलिस ने बंद कर दिया है, आपका भी नाम है।’ इसके बाद मैं पुलिस की नजरों से बचकर जबलपुर चला गया।”
वहां उनकी मुलाकात मिठाई लाल अग्रवाल से हुई, जो उस समय पनागर का संघ कार्य देखते थे। उनके निर्देशों का पालन करते हुए, उन्होंने भूमिगत रहकर कार्य किया। आपातकाल के छह माह बाद उन्हें गिरफ्तारी देने का आदेश प्राप्त हुआ। तब उन्होंने और तीन अन्य लोगों, भगवत पटेल (नेतृत्व में), पवन दास मोतवानी, और द्वारका तिवारी (गढ़ा) के साथ मिलकर पंपलेट बांटे। 10 जनवरी 1976 को कमानिया गेट पर सभा करते हुए उन्होंने अपनी गिरफ्तारियां दीं।
मीसाबंदी ने याद करते हुए बताया कि जब वे गिरफ्तार हुए, तब आदरणीय मिठाई लाल अग्रवाल भेष बदलकर “परछाई की तरह” उन पर निगाह रख रहे थे। जब तक वे लोग जेल तक नहीं पहुंचे, तब तक उनकी निगरानी चलती रही। यह घटनाक्रम आपातकाल के दौरान के संघर्ष और बलिदान की कहानी बयां करता है।







