भोपाल मास्टर प्लान-2047: शहर के 40 हजार व्यापारियों पर मंडराया संकट, महासंघ ने रखी सरकार के सामने 6 बड़ी मांगें

भोपाल मास्टर प्लान-2047: शहर के 40 हजार व्यापारियों पर मंडराया संकट, महासंघ ने रखी सरकार के सामने 6 बड़ी मांगें
भोपाल, यशभारत। भोपाल मास्टर प्लान-2047 के प्रस्तावित ड्राफ्ट ने शहर के कारोबारियों की नींद उड़ा दी है। नए नियमों और प्रावधानों से राजधानी के करीब 40 हजार व्यापारियों का व्यवसाय संकट में पड़ता नजर आ रहा है। स्थिति यह है कि इस ड्राफ्ट को लेकर अकेले व्यापारियों, किसानों और रहवासियों की तरफ से 2,500 से अधिक आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराए जा चुके हैं। भोपाल व्यापारी महासंघ ने इसे लेकर मोर्चा खोल दिया है और सरकार से प्लान के कई प्रावधानों में तुरंत बदलाव की मांग की है।
भोपाल व्यापारी महासंघ के अध्यक्ष आनंद सोनी ने नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि व्यावसायिक संपत्तियों पर लगने वाली कन्वर्जन फीस के नियम बेहद अस्पष्ट हैं। महासंघ ने मांग की है कि इस शुल्क को बार-बार वसूलने के बजाय केवल एक बार में पांच प्रतिशत (5%) निर्धारित किया जाए, ताकि कारोबार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े। इसके अलावा, कमर्शियल फ्लोर एरिया रेशियो के नियमों को भी व्यावहारिक बनाने की मांग की गई है ताकि पर्याप्त व्यावसायिक निर्माण की अनुमति मिल सके।
अरेरा कॉलोनी और पुराने बाजारों का भविष्य दांव पर
मास्टर प्लान में कई पुराने और स्थापित क्षेत्रों के स्वरूप को लेकर भी असमंजस की स्थिति है। व्यापारियों की मुख्य चिंताएं और सुझाव इस प्रकार हैं:
अरेरा कॉलोनी का वर्गीकरण: महासंघ ने अरेरा कॉलोनी को आवासीय-1 (आरजी-1) श्रेणी में ही बनाए रखने की मांग की है।
मार्केट स्ट्रीट का दर्जा: शहर की 12 मीटर से कम चौड़ी सड़कों पर बरसों से संचालित हो रहे पुराने बाजारों को मार्केट स्ट्रीट घोषित किया जाए, जिससे मौजूदा दुकानों के संचालन में कोई कानूनी बाधा न आए।
खाली भूखंडों पर निर्माण: सड़क की चौड़ाई के मानकों के आधार पर खाली भूखंडों पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति दी जाए।
निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व की मांग
व्यापारियों का सबसे बड़ा रोष इस बात को लेकर है कि मास्टर प्लान तैयार करते समय मैदानी हकीकत और व्यापारिक हितों को नजरअंदाज किया गया है। महासंघ ने सरकार से मांग की है कि अंतिम मास्टर प्लान को अंतिम रूप देने से पहले व्यापारी वर्ग के प्रतिनिधियों को निर्णय प्रक्रिया और उच्चस्तरीय बैठकों में शामिल किया जाए।
फिलहाल, हजारों आपत्तियों के बाद अब सभी की निगाहें शासन और नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं कि सरकार इन व्यावहारिक मांगों पर क्या फैसला लेती है।







