इंदौरग्वालियरजबलपुरभोपालमध्य प्रदेशराज्य

26% लिवर है फिर भी जीत लाई डबल गोल्ड:वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में भोपाल की बेटी ने नाम रोशन किया, ऐसा करने वाली वो देश की पहली एथलीट

भोपाल की अंकिता श्रीवास्तव ने ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स 2023 में 21 अप्रैल को तीन पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया है। उन्हें लॉन्ग जंप में गोल्ड और रेसवॉक व शॉट पुट इवेंट में सिल्वर मेडल मिला है। यहीं नहीं अंकिता ने वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स 2019 में डबल गोल्ड जीता था, जिसके बाद से वह ये कारनामा कर दिखाने वाली देश की पहली एथलीट भी हैं।

यह जानकार हैरानी होगी कि अंकिता अपना 74 प्रतिशत लिवर डोनेट कर चुकी हैं। उनकी उपलब्धियां जानने के बाद कोई यह नहीं कह सकता कि उन्हें किसी भी तरह की शारीरिक तकलीफ है। वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में वो खिलाड़ी पार्टिसिपेट करते हैं जो अपना कोई अंग डोनेट कर चुके हों। मां के लिए 18 साल की उम्र में ही अंकिता ने अपना लिवर डोनेट कर दिया, लेकिन यह इतना आसान नहीं था।

मां को लिवर डोनेट करने के लिए बढ़ाना पड़ा था वजन मगर मां को नहीं बचा सके

लिवर डोनेट करने के लिए मुझे 7 साल इंतजार करना पड़ा, लेकिन वह 7 साल मेरे लिए किसी भयानक समय जैसा था। जिस उम्र में बच्चे स्कूल के बाद ट्यूशन पढ़ने जाते थे, मैं अपनी मां को एंडोस्कोपी के लिए अस्पताल ले जाया करती थी। अपनी मां को उस हालत में देखकर मैं असहाय महसूस करती थी। जब मैं 18 साल की हुई तब मैंने अपना लिवर डोनेट किया, लेकिन यह इतना आसान नहीं था।

2014 में किसी को नहीं पता था कि लिवर ट्रांसप्लांट क्या होता है? गूगल पर भी ज़्यादा जानकारी और तस्वीरें मौजूद नहीं थी। हार्ट ट्रांसप्लांट की तरह ही लिवर ट्रांसप्लांट में डोनर की जान जाने का खतरा रहता है। डॉक्टर और परिवार मुझे मना कर रहे थे। मगर मैं अड़ गई थी कि मेरी मां ने मुझे जन्म दिया। यह मेरा फर्ज था कि मैं अपनी मां को अपना एक हिस्सा दे सकूं। यह सबसे छोटी चीज़ थी जो एक बेटी अपनी मां के लिए कर सकती थी।

ऑपरेशन दिल्ली के अपोलो अस्पताल में होना था। साल 2014 की बात है जब मैंने खुद को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करना शुरू किया। उस समय मेरा वजन 50 किलो था। जबकि मेरी मां का वजन मुझसे दोगुना था। मुझे अपना लिवर डोनेट करने के लिए अपना वजन बढ़ाना जरूरी था। मैंने बहुत खाना खाया। और एक दिन अपनी मंजिल पर पहुंच गई। जब ट्रांसप्लांट का समय आया तो मेरी मां कोमा में चली गई। हमें और इंतजार करना पड़ा। ऑपरेशन के दौरान मैंने अपनी मां को अपना 74 प्रतिशत लिवर डोनेट कर दिया, लेकिन अफसोस इस बात का है कि ट्रांसप्लांट करवाने के चार महीने बाद ही जून 2014 में मेरी मां गुजर गई।

वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स ने भरी नई ऊर्जा

रिकवरी के दौरान मेरे पिता ने मुझे उनके एक दोस्त से मिलवाया। उनका हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था। उन्होंने मुझे वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के बारे में बताया था। उस समय राष्ट्रीय खेलों के लिए सिलेक्शन चल रहा था। मैं बचपन से ही स्पोर्ट्स में रुचि लेती थी। मुझमें देश के लिए खेलने का जज्बा था। मैंने स्टेट-लेवल पर स्विमिंग और रनिंग जैसे कई खेल खेले थे। मुझे पता था कि ट्रांसप्लांट के बाद मैं दोबारा नहीं खेल पाऊंगी।

जब मुझे वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के बारे में पता चला मुझे लगा यह नया जीवन शुरू करने का सही मौका है। इस विचार ने मुझ में ऊर्जा और उत्साह भर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि मेरी रिकवरी तेज होने लगी। पिछले 10 साल से मैंने बाहर का खाना नहीं खाया है। पिज्जा, बर्गर और कोल्डड्रिंक का सेवन नहीं कर सकती। मुझे एलर्जी हो जाती है। मैंने साल 2017 से तैयारी शुरू कर दी। साल 2018 में मेरा सिलेक्शन हो गया। मैं साल 2019 में न्यू कासल (यूके) अपना पहला वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम खेलने गई और पदक जीता।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button