वेंटिलेटर मौत की आहट नहीं, बल्कि जीवन की नई उम्मीद: बीएमसी में हुआ ‘संजीवनी’ चमत्कार, वेंटिलेटर ने बचाई गर्भवती की जान

सागर यश भारत (संभागीय ब्यूरो)/ बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज (बीएमसी) के डॉक्टरों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वेंटिलेटर मौत की आहट नहीं, बल्कि जीवन की नई उम्मीद है। अक्सर आम जनमानस में यह डर रहता है कि वेंटिलेटर पर जाने का मतलब अंत है, लेकिन बीएमसी में हाल ही में एक गर्भवती महिला को जिस तरह मौत के मुँह से खींचकर वापस लाया गया, वह किसी करिश्मे से कम नहीं है। चिकित्सा विज्ञान की इस आधुनिक ‘संजीवनी’ ने नौवें महीने की गर्भवती महिला को नया जीवन दान दिया है।
सांसों की डोर टूटने ही वाली थी…
मीडिया प्रभारी डॉ. सौरभ जैन ने बताया कि स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में एक गर्भवती महिला को अत्यंत नाजुक हालत में भर्ती कराया गया था। उसे ‘एक्यूट पलमोनरी एडिमा’ जैसी गंभीर बीमारी थी, जिसमें फेफड़ों में पानी भर जाने के कारण सांस लेना नामुमकिन हो जाता है। भर्ती के समय महिला का ऑक्सीजन लेवल गिरकर महज 30-35% रह गया था। यह वह स्थिति थी जहाँ जीवन की डोर लगभग कमजोर पड़ चुकी थी और ऑक्सीजन की भारी कमी से अंगों के फेल होने का खतरा था।
डॉक्टरों की जुगलबंदी और वेंटिलेटर का जादू
मरीज की गंभीरता को देखते हुए उसे तत्काल एनेस्थीसिया आईसीयू में शिफ्ट किया गया। यहाँ चिकित्सकों ने दोतरफा रणनीति अपनाई। एक तरफ विभागाध्यक्ष डॉ. सर्वेश जैन की टीम ने मरीज को एक दिन और एक रात लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा, ताकि शरीर को कृत्रिम ऑक्सीजन मिलती रहे। वहीं दूसरी ओर, दवाओं के जरिए फेफड़ों में जमा पानी को बाहर निकाला गया। इस बीच स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की यूनिट प्रभारी डॉ. जागृति किरण नागर एवं डॉ. रुचि जायसवाल ने प्रसव पूर्व और उपरांत की देखभाल का मोर्चा संभाले रखा।
अंतिम चरण नहीं, जीवन रक्षक तकनीक है वेंटिलेटर
बीएमसी टीम की यह सफलता एक गलत धारणा को तोड़ती है। वेंटिलेटर इलाज का अंतिम चरण नहीं, बल्कि वह जीवन रक्षक तकनीक है जो गंभीर स्थिति में अंगों को आराम देकर रिकवरी का कीमती समय प्रदान करती है। बीएमसी आज उच्च स्तरीय आईसीयू सुविधाओं और कुशल विशेषज्ञों के कारण बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित हो रहा है। महज दो दिनों की गहन चिकित्सा के बाद आज वह महिला और उसका बच्चा पूरी तरह सुरक्षित हैं।







