जीपीएस से लैस गिद्ध, ग्रामीणों में कौतूहल : पैरों में नंबर टैग और शरीर पर ट्रैकिंग डिवाइस देखकर लोग हुए हैरान

यशभारत डिंडोरी।डिंडोरी जिले के अमरपुर जनपद अंतर्गत भेसवाहि के सरई टोला और उमरिया गवारी टोला में इन दिनों एक विशेष गिद्ध के पहुंचने से ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इस गिद्ध के पैरों में नंबर वाला टैग तथा शरीर पर जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस लगा होने के कारण लोगों में उत्सुकता के साथ-साथ आशंका भी पैदा हो गई थी।
ग्रामीणों के अनुसार यह गिद्ध करीब दो दिनों तक क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर बैठता और उड़ान भरता दिखाईu दिया। पक्षी के शरीर पर लगे उपकरण को देखकर कई लोगों ने इसे किसी रहस्यमयी मिशन से जुड़ा पक्षी समझ लिया, जबकि कुछ लोग इसे निगरानी के लिए उपयोग किए जाने वाला पक्षी मान रहे थे।
मामले की जानकारी मिलने पर वन विभाग का अमला मौके पर पहुंचा और पक्षी का निरीक्षण किया। वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को बताया कि यह विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी गिद्ध प्रजाति के संरक्षण कार्यक्रम का हिस्सा है। इसके पैरों में लगाया गया नंबर टैग पहचान के लिए है, जबकि शरीर पर लगा उपकरण जीपीएस ट्रैकर है, जिसकी मदद से विशेषज्ञ गिद्ध की गतिविधियों, प्रवास मार्ग और व्यवहार की निगरानी करते हैं।
वन विभाग के अनुसार संबंधित गिद्ध सिवनी जिले की ओर से डिंडोरी क्षेत्र में पहुंचा था। भोजन की तलाश, मौसम में बदलाव अथवा प्राकृतिक भ्रमण के दौरान वह सरई टोला क्षेत्र तक पहुंच गया। दो दिन क्षेत्र में रहने के बाद वह पुनः आगे की ओर उड़ गया।
गिद्ध को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंचे। बच्चों और बुजुर्गों में इस पक्षी को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। कई ग्रामीणों ने पहली बार इतनी नजदीक से किसी गिद्ध को देखा, वह भी आधुनिक ट्रैकिंग तकनीक के साथ।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार गिद्ध पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मृत पशुओं को खाकर प्राकृतिक सफाई का कार्य करते हैं, जिससे कई प्रकार की बीमारियों के प्रसार को रोकने में मदद मिलती है। पिछले कुछ वर्षों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते उनके संरक्षण और अध्ययन के लिए टैगिंग एवं जीपीएस मॉनिटरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।
इस अनोखे मेहमान की मौजूदगी ने क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का काम किया है। जिस पक्षी को शुरू में ग्रामीण रहस्यमयी मान रहे थे, वही अब संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में चर्चा का विषय बन गया है।







