ऐसे में कैसे होगा 26 जनवरी से पहले अशोक स्तंभ का निर्माण, ऐतिहासिक अशोक स्तंभ को 18 जनवरी को किया ध्वस्त

उमरियापान, यशभारत। उमरियापान के मुख्य मार्केट झंडा चौक में स्थापित अशोक स्तंभ को बीते दिनों जेसीबी मशीन से ग्राम पंचायत द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद से नगर सहित क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। नगर के कांग्रेस नेता स्व. शंभू भाटिया चौरसिया ने 5-6 दशक पूर्व मिर्जापुर के चुनार से प्राचीन पत्थर बलुआ के अशोक स्तंभ को बुलवाकर नगर के हृदय स्थल झंडा चौक में 15 फिट की छतरी नुमा का निर्माण करवाकर उसके ऊपर चारों दिशाओं से दहाड़ते सिंहों वाले अशोक स्तंभ को स्थापित करवाया था। जहां 6 दशक पूर्व से आज भी हर वर्ष 26 जनवरी और 15 अगस्त को आन बान शान से ध्वजारोहण किया जाता है। लेकिन अब अशोक स्तंभ के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद से मुख्य मार्केट झंडा चौक वीरान जैसा नजर आ रहा है। जानकारी के अनुसार नगर के मुख्य मार्केट झंडा चौक में स्थापित अशोक स्तंभ को 18 जनवरी की रात्रि जेसीबी मशीन से ग्राम पंचायत द्वारा ध्वस्त करने के बाद से नगरवासी एक ही चर्चा कर रहे हैं की,यदि ग्राम पंचायत को इसी मंथर गति से निर्माण करना था तो 26 जनवरी के बाद अशोक स्तंभ को ध्वस्त करना था। हर वर्ष की तरह 26 जनवरी को ध्वजारोहण का कार्यक्रम तो हो जाता।
पंचायत के पास पैसों की कडक़ी
सरपंच अटल ब्यौहार द्वारा नया अशोक स्तंभ 26 जनवरी से पहले पुन: स्थापित करने के लिए पूरा प्रयास करने की बात कही गई थी। लेकिन निर्माण तो दूर 5 बाई 5 का गोल आकार की लंबाई और चौड़ाई एवं 4 फिट जमीन के नीचे प्लिंथ की तुड़ाई केंचुआ की गति जैसे चल रही हैए उसे देखकर नगरवासियों को अब 1 प्रतिशत भी विश्वास नहीं है की 26 जनवरी से पहले अशोक स्तंभ का निर्माण हो जाएगा। आज 5वां दिन हो रहा है, उसके बावजूद भी अभी तक सिर्फ प्लिंथ ही तो?ा गया है और गड्डा हुआ। वहीं नगर में सबसे ज्यादा एक ही चर्चा हो रही है की कटनी जिला की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत होने के बाद भी मलबा फिंकवाने के लिए एक वाहन तक नहीं लगाया गया है और 4 चके के हाथ ठेला से मलबा फिंकवाया जा रहा है। जबकि जिस चीज का निर्माण कार्य होना है इतना संवेदनशील मामला है, उसके बाद भी ढुल मुल रवैया अपनाया जा रहा है।
सही कार्य योजना बनती तो एक सप्ताह में हो जाता निर्माण
क्षेत्रवासियों का कहना है की यदि सही कार्य योजना बनाई गई होती तो निर्माण कार्य के लिए एक सप्ताह का प्रयाप्त समय था और पूरा निर्माण भी हो जाता। लेकिन रात्रि 9 बजे से वो भी अंधख्याह में बगैर प्रकाश व्यवस्था के मात्र 3 से 4 घंटे प्लिंथ की तुड़ाई का कार्य किया जा रहा है। यदि युद्व स्तर पर कार्य किया जाता तो एक दिन में बड़ी मशीनों से प्लिंथ टूट जाता और 2 दिन में पूरा नया प्लिंथ पड़ जाता और 3 से 4 दिन के बाद तैयार रखा अशोक स्तंभ का ढांचा रख दिया जाता। लेकिन अब असंभव है। नगरवासियों का कहना है यदि ग्राम पंचायत को इसी मंथर गति से निर्माण कार्य करना था तो 26 जनवरी को ध्वजारोहण का कार्यक्रम हो जाने के बाद पुराने अशोक स्तंभ को ध्वस्त करना था। जबकि देश में अशोक स्तंभ का बड़ा इतिहास है। अशोक स्तंभ के सिंहों को 26 जनवरी 1950 को ही राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता दी गई थी। सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में देश भर में लगभग 30 स्तंभों का निर्माण करवाया था, जो भारत के अलग.अलग हिस्सों में आज भी मौजूद हैं। ये दहाड़ते हुए सिंह धर्म, चक्र, प्रवर्तन का प्रतीक माने जाते हैं। इतना ही नहीं हमारे राष्ट्रीय झंडे के बीच में जो अशोक चक्र का चिन्ह विद्यमान है, वो अशोक स्तंभ से ही लिया गया है। जो भारत की शक्ति और एकता का प्रतीक है।






