जबलपुरमध्य प्रदेश

राजनीतिक दलों की चुप्पी ने बढ़ाई जनता की परेशानी क्या माफिया से मिलीभगत

दूध माफिया का खेल जारी

जबलपुर यश भारत।शहर मै 1 अगस्त से दूध के दामों में ₹3 प्रति लीटर बढ़ोतरी की घोषणा हुई थी। पहले दूध ₹68 से ₹70 प्रति लीटर बिकता था, जो अब ₹73 बताया जा रहा है।
लेकिन शहर की डेयरियों में ₹73 की जगह ₹75 वसूला जा रहा है। फुटकर सिक्कों की कमी का बहाना बनाकर माफिया ने बढ़ोतरी को ₹5–₹7 तक पहुँचा दिया है।
राजनीतिक दलों की चुप्पी जनता असमंजस में
तीन महीने से जारी इस खेल पर किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने ठोस बयान नहीं दिया।
कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी — तीनों के स्थानीय प्रतिनिधि जानते हैं कि शहर में दूध उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली हो रही है, फिर भी किसी ने सड़क पर उतरने की या प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं की।
जनता पूछ रही है क्या यह चुप्पी माफिया से संगमिति का संकेत है या इसे मौन स्वीकृति समझा जाए?
जन संगठनों की भूमिका भी संदिग्ध
दूध आम परिवार की रोजमर्रा की ज़रूरत है, फिर भी उपभोक्ता संगठनों और सामाजिक संस्थाओं की सक्रियता न के बराबर रही। कुछ जन संगठनों ने विरोध जताया, लेकिन वह भी औपचारिक बयान तक सीमित रहा।
किसी ने संयुक्त रूप से प्रशासन को ज्ञापन नहीं सौंपा, न जन आंदोलन खड़ा किया।
ऐसे में अब जन संगठनों की भूमिका भी कठघरे में है।
प्रशासनिक मौन और माफिया का लाभ
खाद्य विभाग और नगर प्रशासन इस पूरे मामले में लगभग निष्क्रिय हैं।
डेरी संचालक खुलेआम ₹73 की जगह ₹75 वसूल रहे हैं, लेकिन किसी के खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं हुई।
सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों को स्थिति की जानकारी है, पर वे “अभियान शुरू करने की तैयारी में” जैसे बहाने देते रहते हैं। इस उदासीनता का सीधा लाभ माफिया को मिल रहा है।
हर तरफ़ चुप्पी हम ही भुगत रहे हैं”
शहर के उपभोक्ताओं का कहना है कि “राजनेता सिर्फ बयानबाज़ी में व्यस्त हैं, कोई वास्तविक कार्रवाई नहीं कर रहा।
हर सुबह ₹75 का दूध लेना पड़ता है, पर कोई पूछने वाला नहीं।”
कई उपभोक्ता संगठनों ने भी माना कि “अगर राजनीतिक दबाव नहीं बनेगा तो प्रशासन भी हरकत में नहीं आएगा।”
अब जवाबदेही तय करनी होगी
सवाल सिर्फ दूध की कीमतों का नहीं, बल्कि शहर की शासन-व्यवस्था की संवेदनशीलता का है।
अगर जन संगठनों और राजनीतिक दलों की आवाज़ ही गायब रहेगी, तो माफिया का तंत्र और मजबूत होता जाएगा।
अब ज़रूरत है कि राजनीतिक दल, समाजसेवी संस्थाएँ और प्रशासन — तीनों जवाबदेही तय करें।
दूध के दाम बढ़े नहीं, जन सरोकार घटा है।
यह मौन शहर की मुनाफाखोरी को वैधता दे रहा है और जनता, हर दिन इसका मूल्य चुका रही है।

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