जबलपुरमध्य प्रदेशराज्य

विजयनगर के दो उद्यानों की हकीकत: एक तरफ उपेक्षा में डूबा आज़ाद पार्क, दूसरी तरफ जनभागीदारी से चमकता गरबा ग्राउंड

जबलपुर। शहर में उद्यानों के रखरखाव, सुरक्षा और उनकी वर्तमान स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विजयनगर के दो प्रमुख उद्यान—चंद्रशेखर आज़ाद पार्क और गरबा ग्राउंड—इस समय नगर निगम और स्मार्ट सिटी लिमिटेड की कार्यप्रणाली का आईना बनकर खड़े हैं। करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद एक उद्यान बर्बादी की कगार पर है, जबकि दूसरा उद्यान पूरी तरह जनभागीदारी पर निर्भर होते हुए भी बेहतर स्थिति में नजर आता है।

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चंद्रशेखर आज़ाद पार्क: उपेक्षा का प्रतीक, अंधेरे में अनैतिक गतिविधियों का केंद्र

स्मार्ट सिटी योजना के तहत करोड़ों रुपये खर्च कर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का कायाकल्प किया गया था। लेकिन आज वास्तविकता बिल्कुल विपरीत है।

शाम ढलते ही पार्क अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बन जाता है।

पार्क में सुरक्षा के नाम पर एक भी चौकीदार मौजूद नहीं।

रोशनी की कमी, टूटी बेंचें और गंदगी यहां आम तस्वीर बन चुकी है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई शिकायतें करने के बावजूद नगर निगम के अधिकारी निरीक्षण तक नहीं करते।

पार्क की यह स्थिति न केवल सरकारी उदासी को दर्शाती है, बल्कि यह स्पष्ट करती है कि रखरखाव की योजनाएं सिर्फ कागजों में चल रही हैं।

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गरबा ग्राउंड: जनसहभागिता से चमकता, सुरक्षित और सुव्यवस्थित उद्यान

वहीं दूसरी तरफ, विजयनगर का गरबा ग्राउंड उस मॉडल का उदाहरण है कि अगर स्थानीय नागरिक आगे आएं तो उद्यान कैसे संवर सकते हैं।

जेडीए द्वारा विकसित और बाद में नगर निगम को सौंपे गए इस उद्यान के चारों ओर मजबूत बाउंड्री वॉल बनाई गई है।

दो व्यवस्थित प्रवेश द्वार, जिनकी नियमित निगरानी होती है।

उद्यान की सुरक्षा और देखरेख स्थानीय नागरिकों, आसपास के निवासियों और जनभागीदारी समूहों द्वारा की जाती है।

रखरखाव के लिए निर्धारित शुल्क लिया जाता है, जिससे नियमित साफ-सफाई, पौधारोपण और मरम्मत का कार्य चलता है।

सुरक्षा के लिए गरबा ग्राउंड लेडीज़ क्लब द्वारा प्राइवेट चौकीदार नियुक्त किया गया है, जो दिनभर निगरानी करता है।

इसी वजह से यह उद्यान न केवल सुरक्षित है बल्कि पूरे क्षेत्र का सबसे सक्रिय, स्वच्छ और परिवारों के लिए अनुकूल स्थान बन गया है।

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निगम और स्मार्ट सिटी पर गंभीर सवाल

दोनों उद्यानों की जमीनी सच्चाई यह दर्शाती है कि—

क्या नगर निगम और स्मार्ट सिटी इतने सीमित हो चुके हैं कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी रखरखाव और सुरक्षा नहीं संभाल पा रहे?

क्या स्वच्छता सर्वेक्षण में मिलने वाला दूसरा स्थान केवल कागजी कारनामा है?

जब एक पार्क पूरी तरह बदहाल हो रहा है और दूसरा जनता के सहयोग से बेहतर चल रहा है, तो सवाल सीधे प्रशासन की जवाबदेही पर उठते हैं।

नया उद्यान निर्माणाधीन: भविष्य पर सवाल कायम

पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड कार्यालय के पास सरदार वल्लभभाई पटेल उद्यान का निर्माण तेजी से जारी है।
लेकिन स्थानीय नागरिकों की चिंता है—

यह उद्यान किस श्रेणी में जाएगा? गरबा ग्राउंड जैसा सुव्यवस्थित, या आज़ाद पार्क जैसा उपेक्षित?

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जिम्मेदारी से बचते निगम अधिकारी

खास बात यह है कि जब नगर निगम के उद्यान संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों से इस विषय में बातचीत करने की कोशिश की गई तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा—

“जो भी जानकारी चाहिए, लिखित आवेदन देकर विभाग से ले लें।”

उन्होंने यह भी बताया कि उनकी ड्यूटी इस समय SIR में लगी है और वे कलेक्ट्रेट में पदस्थ हैं, इसलिए उद्यानों की स्थिति पर बात करने की स्थिति में नहीं हैं।

अधिकारियों का यह रवैया ही शहर के उद्यानों की बदहाली का प्रमुख कारण प्रतीत होता है।

निष्कर्ष

चंद्रशेखर आज़ाद पार्क—उपेक्षा, असुरक्षा और अव्यवस्था की मार झेलता हुआ उद्यान।

गरबा ग्राउंड—जनसहभागिता और जिम्मेदारी से सुसज्जित, सुरक्षित और स्वच्छ उद्यान।

नगर निगम की लापरवाही दोनों उद्यानों के अंतर को साफ उजागर करती है।

जनता सवाल कर रही है—क्या करोड़ों की योजनाएं सिर्फ दिखावा हैं?

जबलपुर शहर के उद्यानों की यह दोहरी तस्वीर भविष्य की योजनाओं और उनकी ईमानदार क्रियान्वयन क्षमता पर गहरा प्रश्नचिह्न छोड़ती है।

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