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बच्चों की मासूमियत पर सोशल मीडिया का हमला 16 साल से कम उम्र वालों पर बैन की सिफारिश

मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र को दिया संदेश

बच्चों की मासूमियत पर सोशल मीडिया का हमला 16 साल से कम उम्र वालों पर बैन की सिफारिश

मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र को दिया संदेश

सोशल मीडिया बच्चों की दुनिया को तेजी से प्रभावित कर रहा है और अब यह उनकी मासूमियत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। अश्लील कंटेंट की आसान उपलब्धता और रील्स की लत से बच्चों को बचाने के लिए मद्रास हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए भारत में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करने को कहा है।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ जिसमें न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन शामिल थे ने इस संबंध में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद केंद्र सरकार को अहम सलाह दी। कोर्ट ने कहा कि बच्चों पर अश्लील और विवादास्पद वीडियो का असर वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक नकारात्मक होता है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में यह स्वीकार किया था कि अश्लील और आपत्तिजनक वीडियो को रोकने के तकनीकी उपाय मौजूद हैं। हालांकि, बच्चों को ऐसी सामग्री से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी सॉफ्टवेयर का उपयोग अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी माना कि वयस्कों के लिए इस तरह की सामग्री देखना या न देखना व्यक्तिगत अधिकार का विषय हो सकता है, लेकिन बच्चों के मामले में राज्य की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है।

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
यदि बच्चे इस तरह के वीडियो देखते हैं, तो उसका उन पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए भारत में भी ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए प्रतिबंध लागू किया जाना चाहिए। तब तक केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ बाल अधिकार संरक्षण आयोगों को बच्चों के बीच जागरूकता फैलाने के ठोस कदम उठाने चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

एस. विजयाकुमार ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ में जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिका में उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर अश्लील तस्वीरें और वीडियो बेहद आसानी से उपलब्ध हैं, जिन्हें कोई भी देख सकता है। यह स्थिति बच्चों के मानसिक और नैतिक विकास के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

याचिका में मांग की गई कि राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिनियम के तहत अदालत, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय और तमिलनाडु बाल अधिकार संरक्षण आयोगों तथा इंटरनेट सेवा प्रदाता संघ को निर्देश दे कि वे अश्लील और आपत्तिजनक वीडियो तक बच्चों की पहुंच रोकने के लिए उपयुक्त सॉफ्टवेयर और तकनीकी उपाय अनिवार्य करें।

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