जबलपुरमध्य प्रदेश

बदलते मौसम के साथ बढ़ती सांस की बीमारियाँ,समय रहते संभलना जरूरी

निद्रा रोग टीबी एवं एलर्जी रोग विशेषज्ञ डॉ भारती ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं

भारत में मौसम का बदलाव केवल गर्मी-सर्दी का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालने वाला संक्रमण काल होता है। विशेषकर सर्दी से गर्मी या गर्मी से बरसात की ओर जाने वाले समय में सांस से जुड़ी बीमारियों के मामलों में अचानक वृद्धि देखी जाती है। मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ संजय भारती ने बताया कि एक पल्मोनोलॉजिस्ट के रूप में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इस मौसम में अस्पतालों में खांसी, सांस फूलना, एलर्जी और दमा के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण केवल संक्रमण नहीं, बल्कि धूल, परागकण, वायु प्रदूषण और तापमान में उतार-चढ़ाव का संयुक्त प्रभाव है।
छाती रोग, स्वांस दमा, निद्रा रोग टीबी एवं एलर्जी रोग विशेषज्ञ डॉ भारती ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।
किन बीमारियों का खतरा बढ़ता है?

वायरल संक्रमण

मौसम बदलते ही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता अस्थायी रूप से कमजोर हो जाती है, जिससे सर्दी-जुकाम, फ्लू और वायरल ब्रोंकाइटिस के मामले बढ़ते हैं। लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी अक्सर इसी संक्रमण का परिणाम होती है।

दमा (अस्थमा) का बढऩा

मौसम परिवर्तन के दौरान हवा में परागकण और धूल की मात्रा बढ़ जाती है। इसके साथ ही कई शहरों में प्रदूषण का स्तर भी ऊँचा रहता है। ये सभी कारक दमा के मरीजों में लक्षणों को अचानक बढ़ा सकते हैं, जैसे सांस फूलना, सीटी जैसी आवाज आना और छाती में जकडऩ।

एलर्जी और साइनस की समस्या

बसंत और शुरुआती गर्मी का समय एलर्जी के लिए अनुकूल होता है। इस दौरान छींक आना, नाक बहना और सिरदर्द जैसी समस्याएँ आम हो जाती हैं। यदि इन्हें नजऱअंदाज़ किया जाए तो यह आगे चलकर ब्रोंकाइटिस या दमा को भी बढ़ा सकती हैं। खासकर उन लोगों में जो धुएँ या प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं। मौसम बदलने पर संक्रमण और प्रदूषण मिलकर इस बीमारी को गंभीर बना सकते हैं।

हमारे देश में श्वसन रोगों का जोखिम कुछ अतिरिक्त कारणों से बढ़ जाता है-
– रसोई के चूल्हे का धुआँ
– कचरा जलाने की प्रवृत्ति
– शहरी वायु प्रदूषण
– धूल भरी हवाएँ

इन परिस्थितियों में मौसम परिवर्तन का प्रभाव और अधिक तीव्र हो जाता है।

बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय-

मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए कुछ सरल उपाय अत्यंत उपयोगी हैं:
– भीड़भाड़ या धूल भरे वातावरण में मास्क का उपयोग करें
– अस्थमा या ष्टह्रक्कष्ठ के मरीज अपनी नियमित दवाएँ जारी रखें
– घर में धूल नियंत्रण रखें
– पर्याप्त पानी पिएँ
– धूम्रपान और धुएँ से दूरी बनाएँ
– फ्लू और न्यूमोकोकल टीकाकरण पर विचार करें

डॉ भारती ने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि खांसी या सांस की तकलीफ 4-5 दिनों से अधिक बनी रहे तो उसे सामान्य मौसमी समस्या मानकर अनदेखा न करें। मौसम का बदलना प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन उससे जुड़ी बीमारियाँ अनिवार्य नहीं हैं। सही जागरूकता, समय पर सावधानी और शुरुआती उपचार से अधिकांश मौसमी श्वसन समस्याओं को रोका जा सकता।

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