धर्म अनिवार्यता का नहीं, आस्था का विषय – धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा को कमजोर कर रहा एडीजी का आदेश

धर्म अनिवार्यता का नहीं, आस्था का विषय
– धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा को कमजोर कर रहा एडीजी का आदेश
संदर्भ – एमपी के पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों में रामचरित मानस का पाठ करने का फरमान
भोपाल यशभारत। पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों में जवानों को रामचरित मानस का पाठ कसे के एडीजी राजाबाबू सिंह के निर्देशों ने एमपी में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों में अपने धर्म और भगवान के प्रति आस्था के भाव होना अच्छी बात है, लेकिन यदि इसे पद के दायित्व के साथ जोड़ दिया जाए, तो इसके पीछे छिपी मंशा पर सवाल उठने लगते हैं। एडीजी राजाबाबू के इस आदेश की प्रथमतया मिश्रित प्रतिक्रिया सामने आई है। गैर हिन्दू साठन और समाजों ने सवाल उठाए हैं कि पुलिस जवानों को यदि रामचरित मानस का पाठ करने की सलाह दी जा रही है, तो कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहब से क्या परहेज है। शायद ही किसी राज्य में पुलिस के जवानों को रामचरितमानस का पाठ करने के लिए कहा गया हो। जाहिर है नहीं सुना होगा, लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसा होगा।
मध्यप्रदेश में इस पहल की शुरुआत रंगरूटों के प्रशिक्षण के दौरान की गई है। राज्य के पुलिस प्रशिक्षणा के अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) राजा बाबू सिंह के मुताबिक राज्य के आठ प्रशिक्षण केंद्रों में आने वाले पुलिस के जवान रामचरित मानस के पाठ से जनसेवा, नैतिकता और अनुशासन की प्रेरणा लेंगे। राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के इस निर्देश को लेकर लोग अलग अलग राय रख रहे हैं। कांग्रेस इसमें आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दे चुकी है कि भाजपा सरकार के राज में राम नाम जपने के अलावा दूसरा काम नहीं। काग्रेस कहती है कि प्रशासन तंत्र और पुलिस में बैठे भाजपाई सोच के अफसर कर्मचारियों में भी अपने एजेंडे को लागू करना चाहते हैं, जो भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पर सवाल खड़े करती है। किसी धर्म कापालन और पूजा का मामला निजी पसंद से उपजी आस्था पर आधारित होता है, इसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। एडीजी के आदेश से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने या जिस विचारधारा से वे जुड़े हुए है, उसके एजेंडे को उन्होंने लागू कराने की कोशिश की है, जबकि पुलिस महकमे की ट्रेनिंग का यह कोई विषय नहीं हो सकता।
यशभारत से बातचीत में बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि रामचरित मानस भारतीय समाज की जीवनशैली और दिनचर्या में शामिल है। हिंदू घरों में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम द्वारा स्थापित आदर्शी के आज भी दर्शन होते हैं। राम के आदर्श हमारी परम्परा बन चुके हैं, ऐसे में अलग से कोई आदेश निकालकर पुलिस जवानों को इसके लिए बाध्य करना समझ से परे है। इसमें जो दूसरे समुदाय खासकर मुस्लिम, ईसाई और सिख समाज के
सरकारी कर्मचारी हैं, उनकी अपनी धार्मिक आस्थाओं के बारे में शायद नहीं सोचा गया। स्वाभाविक तौर पर गैर हिन्दु पुलिस जवान एडीजी की मंशा से सहमत नहीं होंगे, भले ही इसमें कोई खोट न हो। कुछ जगहों से ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आ भी चुकी हैं। बातचीत में लोगों ने खुलकर कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहां हर धर्म के लोगों को अपनी मान्यताओं के साथ चलने का अधिकार है। सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हर नागरिक कोइसके लिए सुरक्षा और सुविधा प्रदान की जाए, किंतु एमपी की पुलिस अगर किसी एक धर्म के रंग में रंग गई तो देश के संविधान की प्रस्तावना ही खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता होगी।







