भोपाल में कागजी योजनाओं की भेंट चढ़े स्थायी विसर्जन घाट: ₹25 करोड़ स्वीकृत होने के 14 महीने बाद भी पुराने इंतजामों का सहारा

भोपाल में कागजी योजनाओं की भेंट चढ़े स्थायी विसर्जन घाट: ₹25 करोड़ स्वीकृत होने के 14 महीने बाद भी पुराने इंतजामों का सहारा
भोपाल, यशभारत। राजधानी में गणेशोत्सव की धूम के बीच इस बार भी गणपति विसर्जन की तैयारियों को लेकर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर के चारों कोनों में आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल स्थायी विसर्जन घाट बनाने के लिए 14 महीने पहले स्वीकृत हुई करीब ₹25.08 करोड़ की योजना अब भी धरातल पर पूरी तरह आकार नहीं ले सकी है। नतीजतन, इस वर्ष भी श्रद्धालुओं को पुराने और अस्थायी घाटों के भरोसे ही प्रतिमाओं का विसर्जन करना पड़ेगा।
फाइलों में दबा 25 करोड़ का विसर्जन प्रोजेक्ट
नगर निगम ने जुलाई 2025 में शहर में पांच प्रमुख स्थलों पर स्थायी विसर्जन कुंड और अधोसंरचना विकास का प्रस्ताव पास किया था:
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय:** ₹4.45 करोड़
नीलबड़: ₹6.01 करोड़
संजीव नगर: ₹4.77 करोड़
मालीखेड़ी: ₹2.49 करोड़
प्रेमपुरा: ₹7.34 करोड़
दावा था कि 14 महीनों के भीतर भोपाल को सर्वसुविधायुक्त स्थायी विसर्जन स्थल मिल जाएंगे। हालांकि, तय सीमा बीत जाने के बाद केवल मालीखेड़ी घाट का निर्माण पूरा होने की बात कही जा रही है, जबकि नीलबड़ का मुख्य प्रोजेक्ट तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से अटका पड़ा है।
पर्यावरण नियमों की अनदेखी और जलस्रोतों पर खतरा
राष्ट्रीय हरित अधिकरण और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के तहत मुख्य जलस्रोतों को रासायनिक रंगों और पीओपी के प्रदूषण से बचाने के लिए पृथक कुंडों में सिंथेटिक लाइनर बिछाना अनिवार्य है।
पर्यावरणविद सुभाष सी. पाण्डेय के अनुसार, भोपाल की 25 से 28 लाख आबादी को देखते हुए शहर में कम से कम 40 से 50 अलग विसर्जन कुंड होने चाहिए। मुख्य जलस्रोतों में सीधी मूर्तियों का विसर्जन पानी की गुणवत्ता और भूजल स्तर दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है।
अस्थायी व्यवस्था का बचाव बनाम राजनीतिक वार
बढ़ते दबाव के बीच महापौर मालती राय ने स्पष्ट किया है कि छोटी प्रतिमाओं के लिए शहरभर में 25 से 30 अस्थायी घाट तैयार किए जा रहे हैं, जबकि बड़ी प्रतिमाओं का विसर्जन 7 प्रमुख घाटों पर किया जाएगा।
दूसरी ओर, विपक्ष ने इस देरी को सीधा प्रशासनिक भ्रष्टाचार करार दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता स्वदेश शर्मा ने आरोप लगाया कि स्वीकृत बजट का उपयोग धरातल पर नजर नहीं आ रहा है और करोड़ों रुपये विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गए हैं। विसर्जन का समय निकट आने पर भी स्थायी व्यवस्था का न होना नगर निगम के नियोजन पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।







