उतरप्रदेशदेश

महा-खुलासा: अनुमति कहीं की, डकैती पड़ोसी के खेतों पर! अखबार की सुर्खी के बाद भी ‘कुंभकर्णी नींद’ में बाराबंकी प्रशासन

गरीबों का चालान काटने वाली कोठी पुलिस और आरटीओ, माफिया के 14-चक्का 'यमराजों' के आगे नतमस्तक!

कोठी/बाराबंकी: क्या उत्तर प्रदेश सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और ‘भू-माफिया विरोधी कानून’ बाराबंकी जिले की नवाबगंज तहसील की सीमाओं में आकर दम तोड़ चुके हैं? क्या सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के सख्त और खौफनाक आदेशों की हैसियत यहाँ के कोठी थाना क्षेत्र में सिर्फ एक रद्दी के टुकड़े जितनी रह गई है? यह हम नहीं, बल्कि नवाबगंज तहसील के कोटवा गांव के जमीनी हालात चीख-चीख कर कह रहे हैं। कोटवा की सीमा में कदम रखते ही भ्रष्टाचार, रसूख और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से मची तबाही की ऐसी खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर सामने आती है, जिसे जिले के किसी वातानुकूलित दफ्तर में बैठे ‘साहब’ देखना ही नहीं चाहते। ‘इस महा-फर्जीवाड़े का पर्दाफाश होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगा है। यह रहस्यमयी खामोशी साफ गवाही दे रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है!

वैध अनुमति का मुखौटा, पड़ोसी के खेतों पर डाका!

कागजी मायाजाल और सेटिंग-गेटिंग के खेल में खनन विभाग ने माफियाओं को एक निश्चित गाटा संख्या (खसरा नंबर) पर मिट्टी हटाने का ‘परमिशन’ थमाया था। नियम तो यह कहता है कि इस गाटा संख्या के चारों तरफ लाल झंडे या पिलर लगाकर बकायदा सीमांकन होना चाहिए था। लेकिन मौके पर नियम-कायदे हवा में तैर रहे हैं।

खौफनाक सच: चर्चा है कि इस परमिशन की आड़ में खनन माफियाओं ने उन गरीब किसानों के पड़ोसी गाटा नंबरों पर जेसीबी और पोकलैंड के जरिए सरेआम ‘डाका’ डालना शुरू कर दिया है, जिन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन बेचने से साफ मना कर दिया था। खेतों को चारों तरफ से 10 से 15 फीट गहरा खोदकर ‘मौत का कुआं’ बना दिया गया है। नतीजा? पड़ोसी किसानों के खेत अब ताश के पत्तों की तरह ढहने की कगार पर हैं। गरीब किसान अपनी छाती पर ट्रैक्टर चलते देख, अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए रात-रात भर लाठी लेकर मेढ़ों पर पहरा देने को मजबूर हैं।

सिस्टम का नंगा दोगलापन: किसान को चालान, माफिया को सेल्यूट!

कोटवा के रास्तों पर परिवहन विभाग (आरटीओ) और कोठी पुलिस का दोहरा मापदंड और नंगा दोगलापन देखकर किसी का भी खून खौल उठेगा।

गरीबों पर सिंघम: दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करके बच्चों का पेट पालने वाले किसी गरीब किसान की ट्रैक्टर-ट्रॉली या मजदूर के छोटे वाहन को चौराहे पर कोठी पुलिस ऐसे घेरती है, जैसे वो कोई इनामी डकैत हों। कागजात और ओवरलोडिंग के नाम पर उनका हजारों का चालान काटकर जेब ढीली कर दी जाती है।

माफिया पर मेहरबान: दूसरी तरफ खनन माफिया के वो 14-चक्का खूंखार डंपर हैं, जो बिना तिरपाल ढके, आकंठ ओवरलोड होकर 70 से 80 किमी/घंटे की यमराज जैसी रफ्तार से मुख्य सड़कों पर मौत का तांडव मचा रहे हैं। इन्हें न तो कोठी पुलिस रोकती है और न ही आरटीओ का कोई सिपाही हाथ देने की हिम्मत करता है। साफ है, यह अंधापन बिना किसी ‘मोटे मासिक चढ़ावे’ और मलाईदार डील के मुमकिन नहीं है!

एनजीटी के नियमों का मर्डर, बच्चों के लिए ‘जल-समाधि’ का इंतजाम

उत्तर प्रदेश उपखनिज नियमावली और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का सख्त कानून है कि साधारण खनन में 3 फीट (1 मीटर) से ज्यादा गहरी खुदाई पर्यावरण की क्रूर हत्या है। उड़ती धूल को रोकने के लिए दिन में 3 बार पानी का छिड़काव और डंपरों को गीली तिरपाल से ढकना अनिवार्य है। लेकिन कोटवा में नियमों की धज्जियां उड़ाकर 15 फीट गहरे गड्ढे खोद दिए गए हैं, जो आने वाली मानसूनी बारिश में मासूम बच्चों के लिए ‘जल-समाधि’ का परमानेंट इंतजाम बन चुके हैं। इन डंफ़रों से उड़ने वाली धूल की सफेद और जानलेवा परत ने किसानों की हरी-भरी सब्जियों को बर्बाद कर दिया है, और गांव के स्कूली बच्चे फेफड़ों व सांस (अस्थमा) जैसी गंभीर बीमारियों की भट्टी में झोंके जा रहे हैं।

साहब का रटा-रटाया जवाब: “जांच कर कार्रवाई होगी”

जब इस सुलगते मामले को लेकर उपजिलाधिकारी (एसडीएम) नवाबगंज के सीयूजी नंबर पर घंटी बजाई गई, तो फोन पर तहसीलदार नवाबगंज उपेंद्र ने फोन रिसीव किया। उन्होंने सरकारी ढर्रे वाला वही घिसा-पिटा और रटा-रटाया बयान जारी करते हुए कहा— “मामला जानकारी में आया है, कल जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।” अब देखना यह है कि यह ‘कल’ कब आता है या फिर जांच की फाइल भी रसूखदारों की तिजोरी में दफन हो जाती है।

अल्टीमेटम: नहीं हुई कार्रवाई तो उच्च अधिकारियों से होगी शिकायत

कोटवा गांव के आक्रोशित ग्रामीणों और जागरूक मंचों ने जिला प्रशासन को सीधे शब्दों में चेतावनी दे दी है: कोटवा गांव में मानकों की धज्जियां उड़ाकर हो रहे इस खूनी खनन को तत्काल प्रभाव से बंद कराया जाए। सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे ओवरलोड डंपरों और पोकलैंड मशीनों को तुरंत सीज किया जाए। माफिया को अपनी छत्रछाया देने वाले क्षेत्रीय लेखपाल, कानूनगो और संबंधित खान निरीक्षक को सस्पेंड कर विभागीय जांच बैठाई जाए। साफ चेतावनी है कि यदि इस बड़े खुलासे के बाद भी बाराबंकी प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली और दोषियों पर गाज नहीं गिरी, तो इस भ्रष्टाचार की गूंज सीधे लखनऊ के मुख्यमंत्री कार्यालय (पंचम तल) तक गूंजेगी और लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाएगी!

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button