*जबलपुर के महापौर* *ज़मीनी आदमी दादा गुलाब चन्द गुप्ता जब जबलपुर के महापौर बने*

सात रूपए मासिक वेतन पर भर्रू की कलम से बही खाते लिखने वाले गुलाब चन्द गुप्ता को भले ही बिहारीलाल खजांची का मुनीम कहा जाता रहा हो, लेकिन वास्तव में वे तो कलम के ही मजदूर थे। किसे पता था कि यही कलम का मजदूर एक दिन जबलपुर का महापौर ही नहीं मध्यप्रदेश विधानसभा का सदस्य भी निर्वाचित होगा। जबलपुर नगर निगम में डा. एस. सी. बराट के इस्तीफा देने के बाद वर्ष 1965 में गुलाब चन्द गुप्ता चुने गए। उनके साथी व जबलपुर के लोग उन्हें ‘दादा’ कहते थे। गुलाब चन्द गुप्ता अपने पूर्ववर्ती महापौर की तुलना में बिल्कुल अलग थे। उनसे पूर्व जबलपुर के जितने महापौर हुए वे साहित्यकार, शिक्षक, उद्यमी, चिकित्सक थे। गुलाब चन्द गुप्ता ज़मीनी आदमी थे। उनके पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं थी, उनकी विद्यालयीन शिक्षा भी कम थी पर संसार के जगत विश्वविद्यालय में उन्होंने जो शिक्षा पाई थी वह ऐसी विलक्षण और मेरीटोरियस थी जिसने गुलाब दादा के जीवन को पुरूषार्थी, उदात्त और व्यावहारिक बना दिया था। उनकी सूझबूझ व दूरदर्शिता किसी श्रेष्ठ व्यक्ति से कम नहीं थी। दादा गुलाब चन्द गुप्ता जबलपुर की अक्खड़पन व फक्कड़पन परंपरा के प्रतिनिधि थे।
उनकी सहज बुद्धि का लोहा सभी लोग मानते थे। दादा इस संसार के ऐसे यात्री थे जिन्होंने अपनी मंज़िल पा ली थी। वे उस जनता के लिए जीते थे जिस जनता के प्रतिनिधित्व का दायित्व उन्होंने लिया था। उस दायित्व को वे अपनी बुद्धि, युक्ति और शक्ति के समन्वय से पूरा करते थे। जिस दिन उनका दायित्व पूरा हो गया उस दिन वे भगवान के प्यारे हो गए।
दादा गुलाब चन्द का आरंभिक जीवन कष्टों, आपदाओं और भीषण गरीबी में बीता था। जब वे स्वतंत्रता आंदोलन में कारावास में थे, तब पत्नी की बीमारी का समाचार आया। लोगों ने कहा ‘पेरोल’ पर जा कर देखना चाहिए। तब उन्होंने उत्तर दिया-मैं आवेदन नहीं करूंगा। और जब वह चल ही बसी तो संस्कार के लिए अधिकारियों ने जाने की अनुमति दी तो दादा गुलाब चन्द ने जाना स्वीकार नहीं किया। दीवारों के घेरे के बाहर उनकी अनुपस्थिति में ही चिता धू धू कर उठी।
कांग्रेस के मूल से समाजवादी शाखा फूट का निकली थी उसके जबलपुर में प्रमुख स्तंभ दादा गुलाब चन्द गुप्ता थे। वे सक्रिय राजनीतिज्ञ थे और कांग्रेस के सुस्थापित वर्ग के विरोध में खड़े हुए। उन्होंने वर्ष 1930 से 1942 तक चारों आंदोलनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और कारावास भोगा। गुलाब चन्द्र गुप्ता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस से गहरा नाता था। उसी सम्पर्क और प्रभाव के कारण उन्होंने अपने पुत्र का नाम सुभाष रखा था। बाद में सभी पुत्रों का नामकरण सुभाष चंद्र बोस के परिवार के सदस्यों के नाम पर हुआ। सुभाष चंद्र बोस त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष पद को त्याग कर फारवर्ड ब्लाक के साथ 6 जुलाई 1939 को जब जबलपुर से मंडला रवाना हुए तब उनके साथ गुलाब चन्द गुप्ता, भवानी प्रसाद तिवारी व सवाईमल जैन भी साथ में थे। गुलाब चन्द गुप्ता और भवानी प्रसाद तिवारी का अभिन्न साथ था। एक बार जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रभुदयाल अग्निहोत्री ने कहा था कि गुलाब दादा और भवानी भाई को जोड़ देने से एक पूरा आदमी बनता था।
वर्ष 1967 में गुलाब चन्द जैन ने कटनी (मुड़वारा-रीठी) विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विजयी हो कर विधायक बने। इस चुनाव में वे जबलपुर से कटनी अपने पुत्र के साथ वेस्पा स्कूटर में जाते थे। वे लोग सौ-सौ मील का सफर स्कूटर पर तय करते थे। विधानसभा पहुंच कर दादा गुलाब चन्द ने प्रथम सत्र से अपनी तीव्र बुद्धि व वाक् पटुता से ऐसा प्रभाव जमाया कि पूरे सदन और भोपाल के पत्रकारों ने उनका लोहा मान लिया। उनके बारे में कहा जाता था कि वे राजनीति के मैदान के विकट खिलाड़ी थे। कभी तो खेल करने के लिए खेल करते और लोगों को मोहरा बना लेते थे। सत्ता से अधिक उन्हें विरोध का खेल खेलने का मज़ा खूब आता था। # *पंकज स्वामी*
_(जबलपुर के महापौर शृंखला की यह अंतिम किश्त है)_







