मध्य प्रदेशराज्य

8 हजार में ‘जिंदगी’ का सौदा : क्लॉटेड ब्लड कांड की जांच रीवा तक पहुंची, दलालों के नेटवर्क पर शिकंजा, निजी ब्लड बैंक की भूमिका जांच के घेरे में

सतना, यश भारत। जिला अस्पताल में क्लॉटेड (थक्का जमा) खून बेचने के मामले ने अब बड़ा रूप ले लिया है। मरीज की मजबूरी को कमाई का जरिया बनाने वाले दलालों का नेटवर्क अब रीवा तक जुड़ता दिखाई दे रहा है। मामले की जांच कर रही तीन सदस्यीय टीम ने पड़ताल तेज कर दी है और जांच की सुई रीवा स्थित विंध्या ब्लड बैंक एंड कंपोनेंट सेंटर तक पहुंच गई है।

 

जांच में सामने आया है कि रीवा के निजी ब्लड बैंक से दो यूनिट खून महज 2100 रुपए में लिया गया था, लेकिन यही खून सतना में मरीज के परिजनों को 8 हजार रुपए में बेचा गया। हैरानी की बात यह है कि परिजनों से यह रकम अभय सिंह नामक व्यक्ति के खाते में यूपीआई के जरिए ट्रांसफर कराई गई। अब यही डिजिटल ट्रांजैक्शन जांच एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सुराग बन गया है।

 

स्वास्थ्य विभाग की जांच टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस पूरे खेल में कौन-कौन लोग शामिल हैं और मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ करने वाला यह नेटवर्क कितने जिलों तक फैला हुआ है। सूत्रों के मुताबिक टीम अगले तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट सिविल सर्जन डॉ. अमर सिंह को सौंपेगी। इसके बाद रीवा CMHO को पत्र भेजकर संबंधित ब्लड बैंक की कार्यप्रणाली और खून के परिवहन की जांच कराई जाएगी। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि ब्लड ट्रांसपोर्ट के दौरान कोल्ड चेन प्रोटोकॉल का पालन हुआ था या नहीं।

 

अधिकारियों का कहना है कि सतना जिला अस्पताल में लगातार निगरानी और सख्ती के चलते स्थानीय स्तर पर सक्रिय दलालों की गतिविधियां कम हुई थीं। इसके बाद अब कुछ लोग पड़ोसी जिलों के निजी ब्लड बैंकों से सांठगांठ कर अवैध तरीके से खून की सप्लाई कर रहे हैं। गंभीर मरीजों और उनके परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे कई गुना अधिक रकम वसूली जा रही है।

 

पूरा मामला शनिवार को उस वक्त सामने आया जब सड़क हादसे में घायल रामऔतार साकेत के लिए रीवा से दो यूनिट खून मंगवाया गया। आर्थो वार्ड में भर्ती मरीज के परिजन दलाल के संपर्क में आए और भारी रकम चुकाकर खून अस्पताल लाए। लेकिन जब लैब में क्रॉस-मैचिंग की गई तो टेक्नीशियनों ने खून को क्लॉटेड और उपयोग के लायक नहीं पाया। इसके बाद अस्पताल में हड़कंप मच गया और खून की दलाली का पूरा मामला उजागर हो गया।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मरीजों की जिंदगी से जुड़े इस संवेदनशील सिस्टम में दलालों की घुसपैठ कैसे हुई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी।

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