
पुण्य स्मरण… 18 मई
पूज्य श्री दद्दा जी : शिवभक्ति, सेवा और सनातन जागरण के अद्वितीय युगपुरुष
कटनी, यशभारत। युग पुरुष अनंत विभूषित मानस मर्मज्ञ गृहस्थ संत परम पूज्य गुरुदेव पंडित देव प्रभाकर शास्त्री ‘दद्दा जी’ केवल एक संत नहीं थे, बल्कि वे सनातन संस्कृति के ऐसे दिव्य प्रकाश स्तंभ थे जिन्होंने शिवभक्ति को जन-जन तक पहुंचाकर एक आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने समाज को केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, बल्कि धर्म को जीवन का उत्सव बनाकर घर-घर तक पहुंचाया। आज जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ “घर-घर महादेव” का उद्घोष सुनाई देता है, उसके पीछे पूज्य दद्दा जी की अथक तपस्या, संकल्प और दिव्य साधना का महान योगदान है।
पूज्य श्री दद्दा जी इस धरा के ऐसे विलक्षण संत थे जिन्होंने “सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं महारुद्राभिषेक यज्ञ” जैसे अलौकिक और दुर्लभ धार्मिक अनुष्ठानों का विराट आयोजन कर सनातन परंपरा की उस महान पूजा पद्धति को पुनर्जीवित किया, जो समय के साथ लगभग लुप्त होती जा रही थी। उन्होंने भगवान शिव की आराधना को केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे प्रत्येक परिवार, प्रत्येक गांव और प्रत्येक श्रद्धालु के जीवन का हिस्सा बना दिया।
उनका संकल्प केवल “हर-हर महादेव” तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने ऐसा वातावरण निर्मित किया कि आज श्रद्धा से लोग कहते हैं —
“अब हर-हर महादेव नहीं, बल्कि घर-घर महादेव गूंजता है।”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि दद्दा जी द्वारा किए गए सनातन जागरण का जीवंत प्रमाण है।
पूज्य दद्दा जी के आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं होते थे, बल्कि वे आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के महायज्ञ बन जाते थे। एक ही आयोजन में वे मानो पाँच महायज्ञ सम्पन्न कराते थे। प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक चलने वाले इन दिव्य आयोजनों में भक्ति, सेवा, ज्ञान और संस्कार का अद्भुत संगम देखने को मिलता था।
प्रातःकाल श्रद्धालुओं द्वारा पार्थिव शिवलिंग निर्माण कराया जाता, जिसमें हजारों लोग मिट्टी से शिवलिंग बनाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना करते थे। उसके पश्चात भजन-कीर्तन, दिव्य महारुद्राभिषेक, वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन एवं महाआरती सम्पन्न होती थी। इन आयोजनों में ऐसा आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो जाता था कि श्रद्धालु स्वयं को शिवमय अनुभव करने लगते थे।
इसके साथ ही विशाल भंडारे का आयोजन होता, जहां बिना किसी भेदभाव के हजारों श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप भोजन कराया जाता था। दोपहर में पूड़ी, सब्जी, दाल, चावल, अचार, पापड़ आदि का स्नेहपूर्ण प्रसाद वितरित किया जाता, जबकि सायंकाल खिचड़ी भोग की व्यवस्था रहती थी। विशेष बात यह थी कि यह समस्त आयोजन पूर्णतः निशुल्क होते थे। केवल भोजन ही नहीं, बल्कि पूजन सामग्री भी श्रद्धालुओं को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती थी। यह दद्दा जी की विशाल हृदयता, सेवा भावना और लोककल्याणकारी दृष्टि का अनुपम उदाहरण था।
सायंकालीन बेला में श्रीमद्भागवत गीता एवं धर्मग्रंथों का महत्व बताया जाता, भजन-संध्या होती और श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कार, संयम तथा आदर्श जीवन का संदेश दिया जाता। उनके प्रवचन केवल शास्त्रों की व्याख्या नहीं होते थे, बल्कि जीवन को सरल, शांत और ईश्वरमय बनाने की प्रेरणा होते थे।
पूज्य दद्दा जी ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा संत वही है जो समाज को जोड़ता है, सेवा को धर्म बनाता है और भक्ति को जन-जन का उत्सव बना देता है। उन्होंने शिवभक्ति को केवल साधना नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानव कल्याण का माध्यम बनाया। उनके आयोजनों में जाति, वर्ग, धन और ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता था — वहां केवल एक ही पहचान होती थी, “हम सब महादेव के भक्त हैं।”
आज भी देश-विदेश में लाखों श्रद्धालु उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं महारुद्राभिषेक जैसे दिव्य आयोजनों को आगे बढ़ा रहे हैं। यह पूज्य दद्दा जी की आध्यात्मिक शक्ति और उनके दिव्य व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि वर्षों बाद भी उनकी प्रेरणा निरंतर समाज को धर्म और सेवा के मार्ग पर अग्रसर कर रही है।
उनकी पुण्य स्मृति में सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए मार्ग — शिवभक्ति, सेवा, संस्कार, सद्भाव और मानवता — को अपने जीवन में उतारें तथा सनातन संस्कृति के इस दिव्य प्रकाश को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
“जहाँ शिवभक्ति सेवा बन जाए,
जहाँ धर्म मानवता से जुड़ जाए,
वहीं से एक युगपुरुष जन्म लेता है —
और वह युगपुरुष थे पूज्य श्री दद्दा जी।”
पुण्य स्मरण दिवस पर कोटिशः नमन 🙏🏻🕉️
“किरण त्रिपाठी”








