उत्तर और दक्षिण भारत में बदल जाएंगे सियासी समीकरण
नए परिसीमन का होगा दीर्घकालिक असर, 816 सीटें होंगी, बहुमत का आंकड़ा होगा 409

उत्तर और दक्षिण भारत में बदल जाएंगे सियासी समीकरण
नए परिसीमन का होगा दीर्घकालिक असर, 816 सीटें होंगी, बहुमत का आंकड़ा होगा 409
33 फीसद आरक्षण के साथ महिलाओं के हिस्से आएंगी 273 सीटें, एमपी में बढ़कर हो सकती 45 सीटें
नई दिल्ली, यशभारत। केंद्र सरकार संसद के मौजूदा सत्र में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने के लिए दो अहम विधेयक लाने की तैयारी में है, जिनमें एक संवैधानिक संशोधन भी शामिल है। प्रस्ताव के अनुसार अगले लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं को 33% सीटों पर आरक्षण दिया जाएगा। सरकार की योजना के तहत लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है, यानी करीब 50% की बढ़ोतरी। इसमें जो अतिरिक्त 273 सीटें जुड़ेंगी, उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा, ताकि मौजूदा सांसदों की सीटें प्रभावित न हों। इसके साथ ही लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा। लोकसभा सीटें बढ़ने का असर मध्यप्रदेश में भी पड़ेगा। यहां वर्तमान में 29 लोकसभा सीटें हैं जो बढ़कर 42 से 45 तक हो सकती हैं। इस प्रस्ताव का असर राज्यों के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ने वाला है।
देश की सियासत की बारीक समझ रखने वाले मानते हैं कि कुछ राजनीतिक दलों ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को भांपते हुए अपनी महिला विंग को मजबूत करते हुए तैयारी कर ली है, जबकि कुछ पारंपरिक दलों ने इसको लेकर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। इस प्रस्ताव के बीच उत्तर और दक्षिण भारत की सियासत को लेकर सदा से चल रहा विवाद भी अहम बन जाएगा, क्योंकि दक्षिण भारत का कहना है कि उन्होने जनसंख्या नियंत्रण को सफलता पूर्वक लागू करते हुए जनसंख्या को नियंत्रित किया है। जाहिर है जनसंख्या के आधार पर उत्तर भारत में लोक सभा सीटों में ज्यादा बढ़ोत्तरी हो सकती है, जबकि दक्षिण भारत में इस अनुपात में कम लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। वर्तमान स्थिति में उत्तर भारत में बीजेपी का प्रभुत्व है, जबकि दक्षिण में अन्य दलों का। सियासत में इसके दीर्घकालिक प्रभाव सामने आयेंगे।
2011 की जनगणना के आधार पर लागू होगी नई व्यवस्था
सूत्रों के अनुसार इस नई व्यवस्था को 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने की योजना पर विचार चल रहा है। बताया जा रहा है कि सरकार ने इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं के साथ बैठक भी की है, ताकि व्यापक सहमति बनाई जा सके। हालांकि अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सियासी गलियारों में इसकी चर्चा तेज हो गई है।
5 दशकों में पहली बार आया प्रस्ताव
करीब 5 दशकों में पहली बार लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सामने आया है। हालांकि, इस बदलाव का असर राज्यसभा या राज्यों की विधान परिषदों पर नहीं पड़ेगा। सरकार इसके लिए परिसीमन और संविधान संशोधन से जुड़े दो अलग-अलग बिल लाने जा रही है, जिन्हें पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। प्रस्ताव के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार और केरल जैसे राज्यों में सीटों की संख्या में लगभग 50% तक बढ़ोतरी होगी।
SC/ ST वाला समीकरण समझिए
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ेगी और उनमें भी महिलाओं को आरक्षण मिलेगा। हालांकि, इस विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को विपक्ष का समर्थन हासिल करना होगा, क्योंकि दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। विपक्षी दलों ने महिलाओं के आरक्षण के भीतर ओबीसी कोटा शामिल करने की मांग उठाई है, जिससे इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।
विपक्षी दलों ने उठाए सवाल
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रक्रिया कब और कैसे लागू होगी, लेकिन सरकार इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। महिला मतदाताओं की बढ़ती भूमिका को देखते हुए आरक्षण का मुद्दा दलों के लिए अहम चुनावी एजेंडा बन सकता है। सामाजिक दृष्टि से महिला आरक्षण को राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जाता है। समर्थकों का कहना है कि इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और नीति निर्माण में उनका दृष्टिकोण मजबूत होगा. वहीं, कुछ विपक्षी दलों ने इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ने पर सवाल भी उठाए हैं। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा आने वाली चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल सरकार और विपक्ष के बीच इस प्रस्ताव को लेकर बातचीत जारी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि लोकसभा सीटों के विस्तार और महिला आरक्षण की नई रूपरेखा देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी। इतना तय है कि इस प्रस्ताव ने संसद से लेकर जनता तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।







