जबलपुरमध्य प्रदेश

दया करने वालों की जय-जयकार होती है

यश भारत-चिंतन-मनन

हर व्यक्ति अधिक से अधिक धन कमाने के पीछे व्यवहारिकता एवं मानवीय मूल्यों को भूलता जा रहा है। रास्ते में अगर कोई मजबूर व्यक्ति दिख जाए तो कोई बेबसी प्रकट करने के लिए दो पल रूक जाए यही बड़ी बात होती है। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो किसी के लिए अपना एक पल और एक रूपये तक खर्च करने में कंजूसी करते हैं। शायद इसलिए कि उन्हें लगता है, भला पीडति व्यक्ति उनका क्या नाता है। लेकिन ऐसा सोचने से पहले यह शब्द जरूर याद करना चाहिए कि वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्र इस देश ने संसार को दिया है जिसका अर्थ है वसुधा यानी धरती पर रहने वाला हर व्यक्ति हमारा कुटुम्ब है।

अगर विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत् पुराण अथवा अन्य कोई भी पुराण उठाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि हम सभी मनुष्य मनु की संतान हैं। इस नाते हम सभी मनुष्य एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। इस नाते हम सभी को अपने रिश्तेदारों की सहायता करनी चाहिए यही हमारा धर्म है। धर्म ग्रंथों में कहा भी गया है कि दया धर्म का मूल है। इसलिए हर व्यक्ति को बिना किसी लालच और स्वार्थ के जरूरत के समय आगे बढ़कर लोगों की मदद करनी चाहिए। जो ऐसा करते हैं उनका जयजयकार समाज ही नहीं ईश्वर भी करता है। दया करने वाला व्यक्ति कठिन समय आने पर भी अपना गुण नहीं त्यागता है। इसी का उदाहरण है मुगल बादशाह दारा। दारा को औरंगजेब ने बंदी बना लिया। बंदी बना दारा जब शहर के बीच से गुजर रहा था तो उसकी स्थिति देखकर लोग तरस खा रहे थे लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था। एक फकीर ने दारा की स्थिति को देखकर कहा कि, दारा तू जब भी हाथी पर बैठकर इस रास्ते जाता था तो मेरी झोली भरता था। आज क्या फकीर की झोली खाली रहेगी।

दारा ने नज़र उठाकर उस फकीर की ओर देखा और अपने शरीर पर पड़ा दुशाला उठाकर फकीर की ओर फेंक दिया। दारा की बेबसी पर जो लोग सिर झुकाए खड़े थे सभी दारा की उदारता और दयालुता को देखकर जयजयकार करने लगे। दारा का झुका हुआ सिर गर्व से ऊपर उठ गया और औरंगजेब के सैनिकों का सिर शर्म से झुक गया। भले ही आप कभी तीर्थ स्थल न जाएं लेकिन जरूरत के समय लोगों की सहायता कर दें तो कई तीर्थ यात्रा का फल आपको घर बैठे मिल जाता है। भगवान कभी यह नहीं कहते कि लोगों को दबाकर कुचलकर मेरे मंदिर में आओ। जो लोग ऐसा करते हैं उनके मंदिर में प्रवेश करने पर भगवान मंदिर छोड़कर चले जाते हैं। दयालु व्यक्ति के मन में ईश्वर बसता है। मंदिर में तो उसके अंदर का प्रतिबिंब नज़र आता है। दयालु व्यक्ति को तो घर में रखे शिव की तस्वीर में भी शिव की अनुभूति हो जाती है। जबकि धनार्जन में मस्त लोगों को तीर्थ स्थलों में भी ईश्वर की अनुभूति नहीं होती है।

भक्त के भीतर रहते हैं कृष्ण

जब भगवान चैतन्य बनारस में हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन का प्रवर्तन कर रहे थे, तो हजारों लोग उनका अनुसरण कर रहे थे। तत्कालीन बनारस के अत्यंत प्रभावशाली और विद्वान प्रकाशानंद सरस्वती उनको भावुक कहकर उनका उपास करते थे। कभी-कभी भक्तों की आलोचना दार्शनिक यह सोचकर करते हैं कि भक्तगण अंधकार में हैं और दार्शनिक दृष्टि से भोले-भाले भावुक हैं, किंतु यह तथ्य नहीं है। ऐसे अनेक बड़े-बड़े विद्वान पुरुष हैं, जिन्होंने भक्ति का दर्शन प्रस्तुत किया है। किंतु यदि कोई भक्त उनके इस साहित्य का या अपने गुरु का लाभ न भी उठाए और यदि वह अपनी भक्ति में एकनिष्ठ रहे, तो उसके अंतर से कृष्ण स्वयं उसकी सहायता करते हैं। अत कृष्णभावनामृत में रत एकनिष्ठ भक्त ज्ञानरहित नहीं हो सकता। इसके लिए इतनी ही योग्यता चाहिए कि वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहकर भक्ति संपन्न करता रहे। आधुनिक दार्शनिकों का विचार है कि बिना विवेक के शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनके लिए भगवान का उत्तर है जो लोग शुद्धभक्ति में रत हैं, भले ही वे पर्याप्त शिक्षित न हों तथा वैदिक नियमों से पूर्णतया अवगत न हों, किंतु भगवान उनकी सहायता करते ही हैं।

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