शहर के 52 ताल-तलैया तो बचे नहीं, जितने शेष है उनका जीर्णोंदार कर लो दुर्दशा का शिकार शहर के प्रमुख तालाब, ध्यान देने वाला कोई नहीं

जबलपुर यशभारत। वीरांगना रानी दुर्गावती ने ससुर के नाम पर संग्राम सागर, खुद के नाम पर रानीताल और अपने रियासत के दीवान आधार सिंह के नाम पर अधारताल और दासी के नाम पर चेरीताल तालाबाों का निर्माण करवाया था। इस तरह शहर को 52 ताल-तलैयों का शहर कहा जाता था। गोंडवानाकालीन में जनव्यवस्था को वर्ष भर जीवित रखने के लिए उंचाई के हिसाब से तालाब बनाए गए थे, लेकिन समय गुजरने के साथ ही इन तालाबों की दुर्दशा हो गई। कुछ तालाब पूर दिए गए। निगरानी और रखरखाव के अभाव के कारण इनमें कचरा फेंका जाने लगा। अब स्थिति यह है कि प्रशासन ने तालाबों को जीवित करने का बीड़ा उठाया है, लेकिन उनकी हालत जस की तस है।
मढ़ाताल, माढ़ोताल, श्रीनाथ की तलैया कि हालात ऐसी है कि इनकी मौजूदगी का पता लगाना मुश्किल है। अन्य तालाबों में रानीताल, गंगासागर, चैकीताल, हनुमानताल, आधारताल, गोकलपुर, इमरतीताल, प्रेमसागर, संग्रामसागर, देवताल सहित अन्य ताल-तलैया अपने वजूद को बचाने का संघर्ष कर रही हैं। इसमें इक्का-दुक्का तालाबों को स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट लिया है लेकिन जीर्णोद्वार में खानापूर्ति की जा रही है।
नर्मदा का नहीं मिला फायदा
शहर को नर्मदा के साथ ही परियट, गौर जैसी सहायक नदियों का वरदान मिला है। इन सौगातों को सहेजने में दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए जाने से तेजी से प्रदूषित हुआ है। मौजूदा स्थिति यह है कि 52 ताल-तलैयों में से बमुश्किल 36 तालाब ही जीवित बचे हैं, जिनका अस्तित्व खतरे में है।
वाॅटर प्लस का तमगा छिना
शहर में नदी-तालाबों का संरक्षण-संर्वधन करके गंदे पानी को उपचारित कर उसका पुनरू उपयोग करते तो कामयाबी मिलती। 52 ताल-तलैयों के शहर को स्वच्छता सर्वेक्षण में वाटर प्लस-प्लस का तमगा हासिल होता, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी से नगर निगम के अधिकारियों ने नदी, तालाब के नाम पर करोड़ों खर्च किए लेकिन वाटर प्लस-प्लस के हकदार नहीं बन पाए।
ये है मुख्य तालाबों के हाल
गुलौआताल- स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत चार करोड़ की लागत से किया सौंदर्यीकरण।
संग्राम सागर – सौंदर्यीकरण में करीब एक करोड़ किए खर्च हो चुके हैं लेकिन स्थिति जस की तस।इमरती तालाब- साफ-सफाई का अभाव, तालाब में भरी पड़ी चोई।
रानीताल – यह सिमटकर छोटी हो गया, पानी इतना प्रदूषित है कि इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।गोकलपुर – स्थानीय लोग अपने स्तर से कर रहे सफाई।
गोपालबाग- यह तालाब लगभग समाप्त हो चुका है। कचरा फेंका गया है।सीता सरोबर- लाखों रुपये खर्च किए गए हैं लेिकन स्थिति जस की तस है।







