इतिहास दोहरा रहा साल बोरर कीट! : क्या फिर संकट में पड़ेगा मध्य भारत का कीमती ‘साल’?

मंडला। डिंडौरी जिले के समनापुर और बजाग वन क्षेत्र में साल बोरर कीट साल के पेड़ों को चट कर रहा है, जिसके चलते मंडला जिले के मवई वन क्षेत्र में भी गंभीर खतरा मंडरा रहा। लगभग दस साल बाद यह कीट फिर से साल के जंगलों पर संकट बनकर उभरा है। मवई वन परिक्षेत्र, जो डिंडौरी जिले के प्रभावित क्षेत्रों से सटा हुआ है, वहां साल बोरर के हमले की आशंका बढ़ गई है। अमरकंटक के बाद डिंडौरी में यह कीट तेजी से फैल रहा है। हालांकि मवई क्षेत्र में अभी तक सीधे तौर पर बोरर से ग्रसित साल के पेड़ नहीं देखे गए हैं लेकिन सीमावर्ती जंगलों में इसकी मौजूदगी को देखते हुए तत्काल निरीक्षण और प्रभावी नियंत्रण के उपाय करना जरूरी हो गया है।
वन विभाग के अधिकारियों द्वारा अभी भी साल के पेड़ों पर बोरर कीट के हमले का इंतजार किया जा रहा है। इसके बाद ही सघन सर्वेक्षण और बचाव कार्य योजना तैयार कर उस पर अमल किया जाएगा। अधिकारियो की यह लापरवाही से मंडला के मूल्यवान साल के जंगल को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
जानकारी के अनुसार दस वर्ष पूर्व 2015 में मवई के साल वन परिक्षेत्र में साल बोरर कीट का प्रकोप हुआ था। इस हमले से सैकड़ों साल के पेड़ नष्ट हो गए थे। यह कीट इतना खतरनाक होता है कि इसका आकार भले ही चार पांच सेमी का हो, लेकिन यह अच्छे खासे पेड़ों को भी नष्ट करने की क्षमता रखता है। वन विभाग के अधिकारियों द्वारा साल बोरर के प्रकोप की रोकथाम के लिए कई तरह के वैज्ञानिक एक्सपेरिमेंट किए गए। हालांकि दस वर्ष पहले जंगल में इसका प्रभाव इतना अधिक था कि वन महकमा भी इसे नियंत्रित नहीं कर पाया था। इस स्थिति से निपटने और साल बोरर को नष्ट करने के लिए स्थानीय ग्रामीणो की सहायता लेनी पड़ी थी। वन विभाग द्वारा उस समय साल बोरर की एक मुंड लाने पर एक रुपए का भुगतान किया जाता था। इस पहल के तहत उस दौरान करीब चार लाख से अधिक साल बोरर कीट पकड़े गए थे। हाल में डिंडौरी जिले में 13 लाख कीट पकड़े जाने का दावा किया जा रहा है। वन विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से कीट पकड़ो अभियान शुरू किया है। अभियान के तहत ग्रामीणो को कुछ ही दिनों में 25 लाख रुपये की आय भी हुई। इस कीट का प्रकोप जिले के पूर्व करंजिया, पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग वन परिक्षेत्र में फैला हुआ है।
इमारती लकडिय़ों में साल की लकड़ी बेहद मजबूत और भारी होती है, जो इसे विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए उपयोग में आती है। साल के पेड़ सीधे और ऊंचे लगभग 30से 40 फ ीट तक बढ़ते हैं जिससे लंबी और सीधी लकड़ी प्राप्त होती है। इस विशेषता के चलते बड़ी नाव के निर्माण, घरों में इमारती लकड़ी के रूप में और विभिन्न कलाकृतियां बनाने में किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से अंग्रेजों द्वारा भी इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग किया गया था जो इसकी गुणवत्ता और टिकाऊपन का प्रमाण है। साल के पेड़ों को पूर्ण विकसित होने में कई वर्ष लगते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में साल के विशाल जंगल फैले हुए हैं। विशेष रूप सेए मंडला जिले के पूर्व सामान्य वन मंडल के वन परिक्षेत्र मवई और केटीआर में साल के पेड़ बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।







