तीस की उम्र में ही क्यों बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा? जानिए डबल रिस्क की असली वजह दिल की बीमारियों के दो बड़े कारण हैं — हाइपरटेंशन और डिस्लिपिडीमिया

तीस की उम्र में ही क्यों बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा? जानिए डबल रिस्क की असली वजह
दिल की बीमारियों के दो बड़े कारण हैं — हाइपरटेंशन और डिस्लिपिडीमिया
डिस्लिपिडीमिया एक दीर्घकालिक बीमारी है, जिसमें खून में वसा या लिपिड्स का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। लिपिड्स तीन प्रकार के होते हैं — एलडीएल या लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन, एचडीएल या हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन या गुड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स। हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा की गई एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी(ICMR-IN DIAB) में पाया गया कि 20 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में डिस्लिपिडीमिया का प्रसार 81.2% था। यह सर्वे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से चुने गए 1,13,043 प्रतिभागियों पर किया गया था, जिनमें से 79,506 ग्रामीण और 33,537 शहरी क्षेत्र से थे। वहीं, राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देशभर में 1.7 करोड़ लोगों को शामिल करने वाले इस अध्ययन में 28.1% प्रतिभागियों में हाई ब्लड प्रेशर पाया गया। ये आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं और दर्शाते हैं कि डिस्लिपिडीमिया और हाइपरटेंशन दोनों बीमारियां देश में चुपचाप और तेज़ी से बढ़ रही हैं।
इन दोनों स्थितियों के आपसी संबंध पर बात करते हुए ‘गोल्डन हार्ट’ के सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पुष्पराज पटेल ने कहा, “हाइपरटेंशन और डिस्लिपिडीमिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर किसी को इनमें से एक भी बीमारी है और समय पर ध्यान न दिया जाए, तो दूसरी बीमारी भी धीरे-धीरे विकसित हो सकती है। रिसर्च से साबित हुआ है कि हाई ब्लड प्रेशर, डिस्लिपिडीमिया से जुड़ी एक आम सह-रोग स्थिति (कॉमॉरबिडिटी) है, और ये दोनों ही हृदय रोगों के बड़े जोखिम कारक माने जाते हैं।
डिस्लिपिडीमिया और हाइपरटेंशन — दोनों बीमारियों के पीछे एक समान कारण है: जीवनशैली। जैसे-जैसे हम एक अत्यधिक शहरी जीवनशैली की ओर बढ़ रहे हैं, हमारी दिनचर्या दो दुनियाओं के बीच फंसी रह गई है। हम अब भी ऐसा खाना खा रहे हैं जो शक्कर से भरपूर और ट्रांस फैट युक्त है, लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम एक्सरसाइज कर सकें या खाने की आदतों को संतुलित कर पाएं। यही असंतुलन आगे चलकर लंबी अवधि की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है। डिस्लिपिडीमिया को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि लिपिड्स या लिपोप्रोटीन हमारे शरीर में क्या करते हैं। एलडीएल को ‘बैड’ कोलेस्ट्रॉल माना जाता है क्योंकि यह हमारी धमनियों में कोलेस्ट्रॉल जमा करता है, जिससे प्लाक बन सकता है और आगे चलकर ब्लॉकेज, हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो सकता है। एचडीएल शरीर के लिए ‘गुड’ माना जाता है क्योंकि यह शरीर के अन्य हिस्सों से कोलेस्ट्रॉल को लिवर तक ले जाता है, जहां यह बाहर निकाल दिया जाता है। ट्राइग्लिसराइड्स भी हानिकारक होते हैं। इनका स्तर ज़्यादा होने पर धमनियां कठोर या मोटी हो सकती हैं, जिससे स्ट्रोक, हार्ट अटैक और पैंक्रियाटाइटिस (पैंक्रियास की सूजन) का खतरा बढ़ जाता है। डिस्लिपिडीमिया की जांच में शरीर में तीन तरह की वसा (फैट) को देखा जाता है: अगर एलडीएल 100 mg/dl से ज्यादा हो, ट्राइग्लिसराइड्स 150 mg/dl से ज्यादा हो और एचडीएल पुरुषों में 40 से कम या महिलाओं में 50 से कम हो,
तो इसका मतलब है कि शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और उसे कंट्रोल करना ज़रूरी है। हाइपरटेंशन की पहचान दो तरीकों से होती है: या तो व्यक्ति को पहले से हाई बीपी की शिकायत हो
या फिर जांच के समय ब्लड प्रेशर 140/90 mm Hg या उससे ज्यादा मापा जाए — तब इसे हाइपरटेंशन माना जाता है।
इन दोनों स्थितियों के आपसी संबंध पर बात करते हुए ‘गोल्डन हार्ट’ के सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पुष्पराज पटेल ने कहा, “हाइपरटेंशन और डिस्लिपिडीमिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर किसी को इनमें से एक भी बीमारी है और समय पर ध्यान न दिया जाए, तो दूसरी बीमारी भी धीरे-धीरे विकसित हो सकती है। रिसर्च से साबित हुआ है कि हाई ब्लड प्रेशर, डिस्लिपिडीमिया से जुड़ी एक आम सह-रोग स्थिति (कॉमॉरबिडिटी) है, और ये दोनों ही हृदय रोगों के बड़े जोखिम कारक माने जाते हैं।
डिस्लिपिडीमिया यानी खून में वसा का असंतुलन, रक्त नलिकाओं की भीतरी परत को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे ‘नाइट्रिक ऑक्साइड’ का बनना कम हो जाता है — जो शरीर में ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह शरीर की बारोरेफ्लेक्स प्रणाली की संवेदनशीलता को भी घटा सकता है, जिससे ब्लड प्रेशर का स्तर अस्थिर हो सकता है।
डॉ. पटेल बताते हैं कि यह स्थिति बड़ी धमनियों को सख्त बनाकर उनके लचीलापन घटा सकती है, जिससे सिस्टोलिक (ऊपरी) ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। व्यायाम की कमी और वसा युक्त भोजन की अधिकता से मोटापा और डिस्लिपिडीमिया दोनों का खतरा बढ़ता है। मोटापा, निष्क्रिय जीवनशैली और प्रोसेस्ड फूड पर निर्भरता — ये सभी कारण इन दोनों बीमारियों में आमतौर पर पाए जाते हैं। इसलिए अगर ये समस्याएं युवावस्था में ही शुरू हो जाएं और समय रहते सुधार न हो, तो ये गंभीर हृदय रोगों की तरफ ले जा सकती हैं।”
डिस्लिपिडीमिया और हाइपरटेंशन जैसी दो पुरानी बीमारियों को लेकर अब खुलकर बात करने की जरूरत है, क्योंकि ये दिल की सेहत को धीरे-धीरे इस हद तक नुकसान पहुंचा सकती हैं कि उसे संभालना मुश्किल हो जाए। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब इन बीमारियों का असर कम उम्र के लोगों में भी दिखने लगा है। पहले जो बीमारियां 50-60 की उम्र में होती थीं, आज वे 30-35 की उम्र में ही दिख रही हैं।
भारत में बढ़ते कोरोनरी हार्ट डिजीज के मामलों को रोकने के लिए ज़रूरी है कि इन बीमारियों के बेहतर प्रबंधन पर अभी से ध्यान दिया जाए। इसके लिए नीति स्तर पर भी ठोस फैसले लेने की ज़रूरत है — ताकि हमारा युवा वर्ग न सिर्फ लंबी उम्र तक जिए, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन भी जी सके।







