हर केस में वही आंखें, वही कान, वही जुबान!…. शहर का पॉकेट गवाह “बाबी” कानून के नाम पर चलता फिरता स्थायी इंतज़ाम

जबलपुर यश भारत ! सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करना इंदौर के चंदन नगर थाना प्रभारी को भारी पड़ गया।झूठा हलफनामा और फर्जी तरीके से पेश किए गए गवाहों पर जब सर्वोच्च न्यायालय की फटकार पड़ी, तो इंदौर पुलिस की नींद खुली और टीआई इंद्रमणि पटेल को आनन-फानन में लाइन हाजिर कर दिया गया।लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बीमारी सिर्फ इंदौर तक सीमित है?या फिर यह ‘पॉकेट गवाह सिंड्रोम’ प्रदेशभर में फैल चुका है?जबलपुर शहर में वर्षों से ऐसे चेहरे सक्रिय हैं, हर रेड में मौजूद होते हैं
हर मारपीट देख लेते हैं हर एनडीपीएस केस में सूंघ कर सच पहचान लेते हैं और 307 जैसे संगीन मामलों में भी सबसे पहले “मौके पर पहुंच” जाते हैं
ओमती थाना क्षेत्र में ऐसा ही एक पॉकेट गवाह
दो साल पूर्व ओमती थाना क्षेत्र में ऐसा ही एक पॉकेट गवाह बाबी सामने आया था, जो 50 से 60 मामलों में पुलिस का भरोसेमंद ‘प्रत्यक्षदर्शी’ बना रहा।
जब न्यायालय ने पूछा असहज सवाल
माननीय न्यायालय ने उस समय टिप्पणी की थी—“लगभग हर मामले में यही व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शी कैसे हो सकता है?”थाने से स्पष्टीकरण मांगा गया, फाइलें हिलीं, जवाब बने…लेकिन सिस्टम जस का तस रहा।
नाम बदला, इलाका बदला, किरदार वही
आज वही ‘गवाह महोदय’शहर के मध्य थाना क्षेत्र में घूमते देखे जा रहे हैं।केस कोई भी हो—कहानी एक ही, गवाही वही, हस्ताक्षर वही।
क्या होता है ‘पॉकेट गवाह’?
सरल शब्दों में—पॉकेट गवाह वह व्यक्ति होता है,जो थाने की जेब में रखा रहता है।ज़रूरत पड़ी,निकाल लिया।केस कमजोर हुआ,मजबूत कर दिया।सवाल उठा,बयान बदल दिया।यह व्यवस्था कानून की मदद नहीं, न्याय की हत्या है।
सबसे खतरनाक सवाल- कितने थानों में ऐसे गवाह घूम रहे हैं?
कितने केस इन्हीं कंधों पर टंगे हैं?और कितने निर्दोष इस ‘मैनेज्ड गवाही’ की कीमत चुका रहे हैं?सुप्रीम कोर्ट की फटकार एक संकेत है इंदौर का मामला एक चेतावनी है—“पुलिस की कहानी गवाह से नहीं,गवाह की सच्चाई से बननी चाहिए।”अब देखना यह है कि क्या जबलपुर पुलिस खुद अपने ‘स्थायी गवाहों’ का ऑडिट करेगी,या फिर अगली फटकार का इंतज़ार करेगी?
अगर इस प्रकार की जानकारी किसी थाना अंतर्गत प्राप्त होगी तो हमारे द्वारा तुरंत एक्शन लिया जाएगा – संपत उपाध्याय एसपी जबलपुर







