कस्टम मिलिंग से बाहर किए गए नाम बदलकर काम कर रहे राइस मिलर
मुख्यालय की सख्ती के बाद फिर चला डंडा,जबलपुर के अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में

जबलपुर, यश भारत। यश भारत द्वारा पूर्व में प्रकाशित समाचारों के बाद एक बार फिर बड़ा खुलासा सामने आया है। 2025–26 के धान घोटाले में जिन राइस मिलरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज है या विभागीय जांच चल रही है, उन्होंने कागजी हेराफेरी कर मिल का नाम बदलते हुए दोबारा कस्टम मिलिंग शुरू कर दी थी। यश भारत ने इस गड़बड़ी को प्रमुखता से उजागर किया था। अब मुख्यालय के हस्तक्षेप और सख्ती के बाद ऐसे सभी राइस मिलों को फिर से कस्टम मिलिंग से बाहर कर दिया गया है।
कागजों पर हुआ गोलमाल
जानकारी के मुताबिक जिन राइस मिलरों पर गंभीर आरोप थे, उन्हें पहले ही कस्टम मिलिंग से अलग किया जाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नए नाम से फर्म पंजीकृत कर न केवल मिलिंग शुरू कर दिया। मुख्यालय तक मामला पहुंचने के बाद अब इन राइस मिलों पर कार्रवाई की गई है और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
इस पूरे मामले में जबलपुर में पदस्थ अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकार बताते हैं कि किसी भी नई राइस मिल को कस्टम मिलिंग का अनुबंध देने से पहले मानक प्रक्रिया के तहत जियो टैगिंग की जाती है, जिसमें मिल का अक्षांश और देशांतर तय कर अन्य केंद्रों से दूरी का मिलान होता है। इसके साथ ही फिजिकल वेरिफिकेशन, बिजली मीटर, लोड और मशीनों की जांच अनिवार्य होती है।
सभी को थी जानकारी
यदि अधिकारियों ने यह सभी स्टैंडर्ड प्रोसीजर ईमानदारी से अपनाए होते, तो उन्हें साफ पता चल जाता कि यह वही राइस मिल है जो पहले से जांच के दायरे में है। इसके बावजूद काम करने की अनुमति देना संदेह पैदा करता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे थे या फिर भ्रष्टाचार को एक बार फिर संरक्षण दिया जा रहा था। यश भारत द्वारा पहले ही इस विषय को उजागर किया जा चुका था और अधिकारी पूरी तरह अवगत थे, लेकिन गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे रहे। अब मुख्यालय की सख्ती ने पूरे मामले की परतें खोल दी हैं। यश भारत इस मुद्दे पर आगे भी नजर बनाए रखेगा।







