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दिन में तीन बार रंग बदलती है मां महालक्ष्मी की मूर्ति

1100 वर्ष पुराना है श्री मां महालक्ष्मी शक्तिपीठ,पचमठा मंदिर

जबलपुर,यशभारत। जबलपुर में स्थित स्थित श्री मां महालक्ष्मी शक्तिपीठ, पचमठा मंदिर अपने आप में एक विशेष महत्व रखता है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। वैसे तो सप्ताह के सातों दिन यहां भक्तों का तांता बंधा रहता है, लेकिन शुक्रवार के दिन यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

ये है इस मंदिर की खासियत

इस मंदिर में हर सुबह सूर्य की पहली किरण धन की देवी लक्ष्मी जी के चरणों पर पड़ती है। इसके बाद सूर्य की किरण देवी लक्ष्मी के मुखमंडल पर पड़ती है। इस दौरान कुछ पल के लिए सूर्यों के प्रकाश के कारण मां की मूर्ति सोने की दिखाई देती है। बताया जाता है कि ये प्रतिमा दिन में तीन बार अपना रंग बदलती है। भक्तों के अनुसार, सुबह के समय यह प्रतिमा सूर्य की किरणों की वजह से सफेद रंग की दिखाई देती है। वहीं, दोपहर में इसका रंग पीला हो जाता है और शाम को मां लक्ष्मी की प्रतिमा नीली दिखाई पड़ती है। वहीं, इस मंदिर को लेकर यह भी कहा जाता है कि जो भी भक्तगण इस मंदिर में मां महालक्ष्मी के दर्शन करता है उस भक्त की मनचाही मुराद पूरी होती है।

इतना पुराना है मंदिर का इतिहास

मान्यताओं के अनुसार मंदिर का इतिहास 1100 वर्ष पुराना है। इस मंदिर के गर्भगृह में अष्टदल कमल, द्वादश राशि व नवग्रह और महालक्ष्मी की मूर्ति विराजमान है। इस मंदिर की एक खास बात यह भी है कि 25 वर्ष से अखंड-ज्योति जल रही है, जिसमें भक्तों की अटूट आस्था है। मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां नारियल को रक्षा सूत्र में बांधकर रखा जाता है। अन्नकूट के अलावा दिवाली के विशेष अवसर पर भी श्री मां महालक्ष्मी को 56 भोग अर्पित किए जाते हैं।

तंत्र साधना का केंद्र

मां लक्ष्मी का ये अद्भुत मंदिर गोंडवाना शासन में रानी दुर्गावती के विशेष सेवापति रहे दीवान अधार सिंह के नाम से बने अधारताल तालाब में करवाया गया था। इस मंदिर में अमावस की रात भक्तों का तांता लगता है। पचमठा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर एक जमाने में पूरे देश के तांत्रिकों के लिए साधना का विशेष केन्द्र हुआ करता था। कहा जाता है कि मंदिर के चारों तरफ श्रीयंत्र की विशेष रचना है।

दिवाली पर 24 घंटे होता है पूजन

दिवाली में सुबह चार बजे मां लक्ष्मी का दूध, दही, इत्र, पंचगव्य आदि से महाभिषेक किया जाता है। सुबह सात बजे तक ये चलता है। इसके बाद मां का श्रृंगार होता है। दोपहर में आरती की जाती है। रात में एक बजे पंचमेवा से पूजन किया जाता है। भगवान कुबेर का पूजन होता है। इसके बाद मां लक्ष्मी को आहूतियां दी जाती है। इस दौरान विशेष पाठ किए जाते हैं। मंत्र, यंत्र सिद्ध किया जाता है।

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