जबलपुरमध्य प्रदेश

रचना सुर कला और संस्कार की संस्कारधानी

25 अक्टूबर कलाकार दिवस पर विशेष

जबलपुर | यश भारत संवाददाता आचार्य विनोबा भावे ने जबलपुर को “संस्कारधानी” यूं ही नहीं कहा था। यह वह भूमि है, जहां हर युग में कला, अध्यात्म और सृजन का संगम देखने को मिला है। आज जब पूरा देश कलाकार दिवस मना रहा है, तो ऐसे में जबलपुर की उस समृद्ध परंपरा को नमन करना आवश्यक है जिसने भारत को अनगिनत कलाकार, चिंतक और रचनाकार दिए हैं।

अध्यात्म के क्षेत्र में जबलपुर से निकले आचार्य रजनीश (ओशो) और महर्षि महेश योगी ने पूरी दुनिया में भारतीय दर्शन और ध्यान परंपरा का परचम फहराया। उनके अनुयायी आज भी करोड़ों की संख्या में जीवन को नई दिशा दे रहे हैं।
साहित्य और लेखन में हरिशंकर परसाई, सुभद्रा कुमारी चौहान, सेठ गोविंददास, ज्ञानरंजन और पंडित अजय पोहणकर जैसे नामों ने अपने लेखन से समाज में विचार और संवेदना का संचार किया।
चित्रकला के क्षेत्र में ब्यौहार राममनोहर सिन्हा, हरि भटनागर और रमेश पेटरिया जैसे कलाकारों ने भारतीय कला जगत को नई ऊंचाइयां दीं।

अभिनय और फिल्म जगत में जबलपुर ने कई नामचीन चेहरे दिए — प्रेमनाथ, नरेंद्र नाथ, राजेंद्र नाथ, रघुवीर यादव, गोविंद तिवारी और शरद सक्सेना ने अपने अभिनय से रजतपट पर अमिट छाप छोड़ी। संगीत की दुनिया में दिवंगत आदेश श्रीवास्तव ने बतौर संगीतकार शहर की पहचान को नई ऊंचाई दी।

गायन के क्षेत्र में इंदिरा श्रीवास्तव, तापसी नागराज, मुरलीधर नागराज, जगदीश ठाकुर, निरंजन शर्मा जैसे कलाकारों ने आकाशवाणी के दौर में अपनी मधुर आवाज से शहर को विशिष्ट पहचान दी। आज की पीढ़ी के कलाकार — मिठाईलाल चक्रवर्ती, राकेश तिवारी, शहनाज अख्तर, मनीष अग्रवाल और अनवर हुसैन — उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
जादू की दुनिया में जादूगर आनंद, एस.के. निगम, शिल्पी, और वाय एम. बंगाली ने जबलपुर का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। हास्य और व्यंग्य में कुलकर्णी बंधु, के.के. नायकर, रजनीकांत, बलराम वर्मा, संजय गायकवाड और गोपाल तिवारी जैसे कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से लोगों को ठहाकों में झुला दिया।

खेल के मैदान में अर्जुन अवॉर्डी मधु यादव ने शहर का मान बढ़ाया। मंच संचालन की दुनिया में प्रदीप दुबे की आवाज आज भी शहर की पहचान है — स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे आयोजनों में उनका उद्घोष याद किया जाता है। विमलकांत येंडे, प्रभात वर्मा, और राजेंद्र मिश्रा जैसे उद्घोषक भी इस गौरवशाली परंपरा के प्रतीक हैं।
संस्कारधानी जबलपुर सचमुच उस धरती का प्रतीक है जहां सुर, कला और संस्कार एक साथ जीवित हैं — और यही इसे भारत की सांस्कृतिक राजधानी बनाता है।

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