जबलपुरमध्य प्रदेश

ताल-तलैयों के नाम पर तो बसे है कई क्षेत्र, कभी 52 ताल तलईयों का शहर कहलाती थी संस्कारधानी

राजेश शर्मा राजू जबलपुर यश भारत। संस्कारधानी जबलपुर, जिसे कभी “52 ताल-तलैयों का शहर” कहा जाता था, आज अपने इसी गौरव की पहचान को धीरे-धीरे खोता जा रहा है। कभी यहां के तालाब और तलैयां न केवल जल संरक्षण का प्रमुख साधन थीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और सौंदर्य की पहचान भी मानी जाती थीं। समय के साथ शहर के विकास और बढ़ती आबादी की रफ्तार में ज्यादातर तालाब मिट्टी में दफन हो गए, और उनकी जगह अब कंक्रीट के जंगल खड़े हैं। 52 तालाबों की विरासत आज सिमट कर रह गई नामों में इतिहासकारों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पुराने जबलपुर में 52 प्रमुख तालाब और तलैयां थीं, जिनसे शहर की जल आपूर्ति और पर्यावरणीय स्थिति बनी रहती थी।
आज इनमें से कई तालाब या तो सूख गए हैं, पाट दिए गए हैं या अवैध कब्जों की चपेट में आ चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि शहर के कई इलाकों के नाम अब भी उन्हीं तालाबों से जुड़े हुए हैं —
जैसे हनुमानताल, फूटाताल, भंवरताल, खंबाताल, गणेशताल, चेरीताल, मढ़ाताल, रानीताल, आधारताल, कोलाताल, देवताल, ठाकुरताल, हाथीताल, बाबाताल, पांडुताल, संग्राम सागर, महाराज सागर, गंगा सागर, भान तलैया, बेनीसिंह की तलैया, श्रीनाथ की तलैया, साई तलैया, फूलहारी तलैया, ककरैया तलैया, रांझी तलैया, बिजौरी तालाब, फूल सागर, हरी सागर, जलपरी झील, बिलपुरा तालाब आदि।
अगर इन सभी नामों को जोड़ा जाए, तो आज भी शहर में 60 से अधिक स्थान ऐसे हैं, जो तालाबों और तलैयों की विरासत का संकेत देते हैं पर उनमें से अधिकांश अब जलविहीन हो चुके हैं।
बढ़ते अतिक्रमण और अनियोजित विकास ने छीना प्राकृतिक सौंदर्य
बीते तीन दशकों में जबलपुर का स्वरूप तेजी से बदला है। जहां कभी तालाबों के चारों ओर हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट गूंजती थी, वहीं अब अवैध निर्माण, मकान और व्यावसायिक इमारतें खड़ी हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि शहर के कई पुराने तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र पर कब्जे होने से भूजल स्तर गिरा है, और वर्षा जल का प्राकृतिक निकास बाधित हुआ है।
यदि संरक्षण हो तो लौट सकती है संस्कारधानी की पहचान
स्थानीय पर्यावरणविद् बताते हैं कि यदि प्रशासन इन बचे हुए तालाबों का वैज्ञानिक ढंग से पुनर्जीवन करे, तो शहर का जलस्तर सुधर सकता है।
‘अडॉप्ट ए तालाब’ जैसी योजनाएं लागू कर स्कूल, कॉलेज और समाजसेवी संगठनों को जोड़ने की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि —
“तालाब सिर्फ जलाशय नहीं, बल्कि शहर की जीवनरेखा हैं। इन्हें बचाना, शहर की सांसें बचाने जैसा है।”
इतिहास को पुनर्जीवित करने की जरूरत
जबलपुर के वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि शहर की संस्कारिक पहचान उसकी प्राकृतिक धरोहरों और जल संस्कृति से जुड़ी रही है।
“पहले लोग हनुमानताल और रानीताल में स्नान करने आते थे, वहां मेले लगते थे। आज वही स्थान गंदगी और उपेक्षा का शिकार हैं,”
एक बुजुर्ग निवासी ने व्यथा व्यक्त की।
प्रशासन से पहल की उम्मीद
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नगर निगम और प्रशासन को शहर के तालाबों की सूची तैयार कर उनके अस्तित्व की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
साथ ही, जिन स्थानों पर अतिक्रमण हुआ है, वहां कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए और पुनः जल संरक्षण क्षेत्र घोषित किया जाए।
संस्कारधानी के गौरव की कहानी
जबलपुर के तालाब सिर्फ पानी के स्रोत नहीं थे, बल्कि उन्होंने इस शहर की संस्कृति, लोकजीवन और परंपराओं को आकार दिया।
अब वक्त आ गया है कि हम इस गौरवशाली इतिहास को केवल नामों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी जीवित करें।
यदि समय रहते इन जलस्रोतों का संरक्षण नहीं हुआ, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘52 ताल-तलैयों का शहर’ सिर्फ इतिहास की किताब मै रह जायेगा।

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