मंजीत घोषी को मिली जमानत: कांग्रेसी वकीलों के आगे नहीं चली सरकार की मनमानी
संवैधानिक मार्गदर्शन राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा से मिला

नई दिल्ली,एजेंसी। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता असहमति की आवाज़ से असहज हो जाती है। हाल के दिनों में मंजीत घोषी का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। एक सोशल मीडिया पोस्ट—एक ट्वीट—के आधार पर मंजीत घोषी की गिरफ्तारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या आज सवाल पूछना अपराध बन चुका है?
मंजीत घोषी ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपनी बात सोशल मीडिया के माध्यम से रखी। सत्ता को यह असहज लगा और इसके जवाब में कानून की कठोर धाराओं का सहारा लिया गया। गिरफ्तारी, दबाव और डर का माहौल—यह सब एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सोच को चुप कराने की कोशिश थी। सरकार की यह कार्रवाई स्पष्ट रूप से मनमानी और दमनकारी प्रतीत हुई। लेकिन लोकतंत्र की ताक़त यही है कि वह झुकता नहीं। इसी संघर्ष के बीच इंडियन यूथ कांग्रेस लीगल सेल सामने आई। यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा का अभियान था। इस पूरे अभियान का नेतृत्व एडवोकेट रूपेश सिंह भदौरिया ने किया, जिन्होंने पूरे दृढ़ संकल्प के साथ इस अन्याय का सामना किया।
इस अभियान को वैचारिक दिशा और संवैधानिक मार्गदर्शन राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा से मिला। उनके मार्गदर्शन में यह लड़ाई केवल अदालत तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोकतंत्र के मूल मूल्यों की रक्षा का सशक्त प्रयास बनी। कानून की गहरी समझ, संवैधानिक मर्यादाओं और मजबूत कानूनी रणनीति के बल पर अंततः मंजीत घोषी को जमानत मिली।
यह जमानत केवल एक व्यक्ति को मिली राहत नहीं थी, बल्कि यह उन तमाम नागरिकों के लिए संदेश थी जो डर के कारण चुप हो जाते हैं। यह साबित हुआ कि सरकार की मनमानी कानून और संविधान के आगे नहीं टिक सकती, यदि उसे चुनौती देने के लिए संगठित और साहसी प्रयास हों।
आज जब सोशल मीडिया पर लिखे शब्दों को अपराध की श्रेणी में डालने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब यह मामला एक मिसाल बनकर सामने आया है। यह बताता है कि सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, संविधान उससे ऊपर है।







