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जुलूस से न्याय या कैमरे से संतोष?.. अपराध नियंत्रण या आत्मप्रशंसा की परेड—किस ओर जा रही है पुलिस व्यवस्था

जबलपुर यशभारत। शहर में इन दिनों कानून-व्यवस्था से ज़्यादा “जुलूस व्यवस्था” चर्चा में है। छोटे-मोटे चोरी या सामान्य अपराधों में आरोपियों को सरेआम जुलूस में घुमाया जा रहा है और हर कदम पर कैमरों की फ्लैश लाइट यह जताने में जुटी है कि पुलिस ने बड़ी जीत हासिल कर ली है। मानो अपराध पर नहीं, बल्कि पब्लिसिटी पर अंकुश लगाया जा रहा हो।

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छोटे अपराध, बड़ा प्रदर्शन

सवाल यह है कि क्या जुलूस निकालने से अपराध का ग्राफ गिरता है या सिर्फ सोशल मीडिया की टीआरपी बढ़ती है? जिन अपराधों का निपटारा काउंसलिंग, जुर्माना या त्वरित कार्रवाई से हो सकता है, उन्हें भी ‘शोपीस’ बना दिया गया है—ताकि तस्वीरें बोलें और हकीकत खामोश रहे।

हत्याएं जारी, कैमरे चालू

विडंबना यह है कि जिन थाना क्षेत्रों में जुलूसों की धूम है, वहीं लगातार दो-तीन हत्याएं भी दर्ज हो रही हैं। मगर वहां न जुलूस दिखता है, न कैमरा—बस फाइलें भारी होती जाती हैं। कुछ थाना प्रभारी धूप में चश्मा चढ़ाए, बड़े दलबल के साथ ‘शेयर बनवाते’ नज़र आते हैं, जबकि उनके ही क्षेत्र में संगीन अपराध खुलेआम चुनौती दे रहे हैं।

कार्यप्रणाली या किरदार सुधार?

देखना रोचक होगा कि पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में ठोस सुधार लाकर अपराध की जड़ पर वार करती है या छोटे मामलों के जुलूस निकालकर खुद को ‘हीरो’ साबित करने में लगी रहती है। अपराध नियंत्रण रणनीति से होता है, रील्स से नहीं—यह बात कब समझ आएगी?कानून का भय अपराधियों में पैदा होना चाहिए, कैमरे का भय पुलिस में नहीं। जुलूस न्याय नहीं, प्रक्रिया का तमाशा बन जाए,तो अपराध वहीं का वहीं रहता है, बस तस्वीरें बदल जाती हैं। सवाल यह नहीं कि जुलूस निकला या नहीं, सवाल यह है कि शहर सुरक्षित हुआ या नहीं।

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