एसीपी संतोष पटेल के एक वीडियो ने जंगल में छिपे बेबस परिवार को 24 घंटे में ऐसे दिलाया इंसाफ

एसीपी संतोष पटेल के एक वीडियो ने जंगल में छिपे बेबस परिवार को 24 घंटे में ऐसे दिलाया इंसाफ
मेरा यादगार केस
अरविन्द कपिल, भोपाल। पारंपरिक पुलिसिंग की फाइलों और कानूनी पेचीदगियों से इतर, सोशल मीडिया की ताकत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यदि नीयत साफ हो, तो न्याय मिलने में देर नहीं लगती। बालाघाट के बीहड़ जंगलों में पुलिस के खौफ से छिपे एक गरीब आदिवासी परिवार को भोपाल एसीपी संतोष पटेल ने सोशल मीडिया के अनूठे इस्तेमाल से मात्र 24 घंटे के भीतर न्याय दिलाया। इस खास बातचीत में एसीपी संतोष पटेल ने अपने संघर्ष और इस यादगार केस के हर पहलू को साझा किया।
संघर्ष से सफलता का सफर तय करने वाले एसीपी संतोष पटेल मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के छोटे से गांव देवगांव की मिट्टी में जन्मे हैं। उनका बचपन गरीबी और अभावों के बीच बीता। उनके माता-पिता ने मेहनत-मजदूरी की, तेंदू पत्ता बीना और जंगल से शहद निकालकर अपने बच्चों का पेट पाला। संतोष ने खुद बचपन में ईंटें ढोईं, खेतों में पसीना बहाया और फटी चप्पल पहनकर गांव के सरकारी स्कूल से पुरानी किताबों के सहारे पढ़ाई की। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे कोचिंग का खर्च उठाने में असमर्थ थे, तब उन्होंने अपनी काबिलियत और आत्म-अध्ययन पर भरोसा जताया। 3 अगस्त 2015 को उन्होंने एक ऐतिहासिक संकल्प लिया कि जब तक वर्दी और लाल बत्ती वाली गाड़ी नहीं मिल जाती, दाढ़ी नहीं बनाएंगे। दुनिया के तानों और मजाक को अपनी ताकत बनाते हुए महज 15 महीने की कठिन तपस्या के बाद 2018 में उन्होंने एमपीपीएससी पास की और डीएसपी बने। आज भोपाल कोतवाली में सहायक पुलिस आयुक्त के पद पर तैनात संतोष पटेल केवल अपनी वर्दी से नहीं, बल्कि अपनी जमीनी संवेदनशीलता और सोशल मीडिया के जरिए अनोखी पुलिसिंग से लाखों दिलों पर राज कर रहे हैं।
सवाल: सर, इस पूरे वाकये की शुरुआत कैसे हुई? वह कौन सा मंज़र था जिसने आपको झकझोर कर रख दिया?
एसीपी संतोष पटेल: यह बात बीते अप्रैल की है। मैं छुट्टी के बाद बालाघाट के घने जंगलों से गुजरते हुए पहाड़ी पर अपने केम्प पर रहा था। तभी मेरी नज़र झाड़ियों में छिपे एक परिवार पर पड़ी। एक बुजुर्ग अम्मा, उनकी बहू और बेटा ज़मीन पर दुबके हुए थे। जब मैं उनके पास गया, तो बुजुर्ग महिला की आँखों में दहशत थी। वे कांपती आवाज़ में गिड़गिड़ाने लगीं कि साहब! हमें मत पकड़ो, पुलिस आ जाएगी! यह बात मेरे सीने में तीर की तरह चुभी कि एक निरपराध और गरीब आदिवासी परिवार आखिर पुलिस के नाम से इतना खौफज़दा क्यों है।
सवाल: आखिर उस मासूम परिवार के साथ क्या खेल खेला गया था? वे पुलिस से क्यों भाग रहे थे?
एसीपी संतोष पटेल: जब मैंने उन्हें शांत कराया, तो एक रोंगटे खड़े कर देने वाला सच सामने आया। वे शातिर साइबर ठगों का शिकार हुए थे। अपराधियों ने महिला की बहू को लॉटरी और पल्सर बाइक जीतने का चकमा दिया था। टैक्स और फीस के नाम पर उस गरीब परिवार से 16 हजार रुपये ऐंठ लिए गए। जब ठगों ने 25 हजार रुपये और मांगे और परिवार ने मना किया, तो ठगों ने धमकी दी कि अगर पैसे नहीं दिए तो पुलिस भेजकर तुम सबको जेल में सड़ा देंगे। जेल जाने के इसी डर से वह पूरा परिवार अपना घर-बार छोड़कर जंगल की पहाड़ियों में जा छिपा था।
सवाल: आपने अपराधियों का शिकार करने के लिए कौन सा पैंतरा अपनाया?
एसीपी संतोष पटेल: मैंने तुरंत अपनी साइबर टीम के जरिए कॉल की लोकेशन ट्रेस करवाई। लोकेशन निवाड़ी के पृथ्वीपुर की निकली। जब मैंने खुद उस नंबर पर बात की, तो आरोपी के बुंदेलखंडी लहजे से साफ हो गया कि वह उसी इलाके की मछली है।
सवाल: आपने पारंपरिक पुलिसिया कार्रवाई के बजाए सोशल मीडिया का हथियार क्यों उठाया?
एसीपी संतोष पटेल: पारंपरिक पुलिसिंग में एफआईआर, वारंट, टीम भेजने और दबिश में समय लगता है। लेकिन यहाँ एक परिवार खौफ में जंगल में भूखा-प्यासा बैठा था और उनकी जमापूंजी छिन चुकी थी। मुझे तुरंत नतीजे चाहिए थे। मैंने बिना वक्त गंवाए उसी पहाड़ी पर खड़े-खड़े एक गरजता हुआ वीडियो शूट किया और अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर अपलोड कर दिया। उसमें मैंने कड़े लहजे में ललकारा कि जिसने भी इस गरीब महिला का हक मारा है, चुपचाप पैसे लौटा दो… वरना हम तुम्हें ज़मीन के नीचे से भी ढूंढकर उठा लेंगे।
सवाल: इस खुली चेतावनी का क्या असर हुआ? क्या ठग बैकफुट पर आया?
एसीपी संतोष पटेल: असर धमाकेदार रहा। वीडियो पोस्ट होने के 24 घंटे के भीतर उस ठग ने पीड़ित परिवार के खाते में पूरे 16 हजार रुपये वापस ट्रांसफर कर दिए। सबसे दिलचस्प बात तो यह निकली कि वह साइबर ठग सोशल मीडिया पर एक्टिव था। जब उसने देखा कि वीडियो वायरल हो रहा है और खाकी उसकी गर्दन तक पहुँच चुकी है, तो उसकी घिग्घी बंध गई और उसने अपनी गलती सुधार ली।
सवाल: इस केस से समाज और पुलिस तंत्र को क्या सबक मिलता है?
एसीपी संतोष पटेल: यह केस मेरे दिल के सबसे करीब है क्योंकि जहाँ पारंपरिक पुलिसिंग के हाथ बंधे थे, वहाँ सोशल मीडिया की ताकत और डिजिटल संवाद ने ढाल बनकर गरीब का हक वापस दिलाया। मैं हर नागरिक से कहना चाहता हूँ कि किसी भी लालच में न पड़ें क्योंकि कोई भी लॉटरी या कंपनी मुफ्त में कार या पैसे नहीं बांटती। पुलिस आपकी मित्र है, डरें नहीं। खाकी आपकी हिफाज़त के लिए है और अगर कोई भी अपराधी आपको पुलिस का खौफ दिखाता है, तो घबराएं नहीं, सीधे अपने नजदीकी पुलिस अधिकारी से संपर्क करें।
सवाल: जो युवा पुलिस सेवा में आना चाहते हैं, उनके लिए आपका क्या सकारात्मक संदेश है?
एसीपी संतोष पटेल: खाकी में आने का सपना देखने वाले युवाओं से मैं यही कहूँगा कि वर्दी सिर्फ एक नौकरी, रोब या ताकत दिखाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज की सेवा करने और किसी बेबस के चेहरे पर मुस्कान लाने का सबसे बड़ा माध्यम है। अगर आपके इरादे मजबूत हैं और नीयत साफ है, तो कोई भी गरीबी या अभाव आपके सपनों को नहीं रोक सकता। जब आप वर्दी पहनें, तो याद रखें कि जनता आपसे डरनी नहीं चाहिए, बल्कि मुसीबत में सबसे पहले आपके पास आनी चाहिए। तकनीक और सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करके आप किसी भी बेबस की जिंदगी बदल सकते हैं, इसलिए ईमानदारी, लगन और संवेदनशीलता को अपना हथियार बनाएं ताकि सफलता आपके कदम चूमे।







