
जहरीले पानी से खेती पर हाईकोर्ट सख्त, नालों के दूषित पानी के उपयोग पर तत्काल रोक के आदेश
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर शहर में नालों और नालियों के दूषित पानी से खेती, पीने और नहाने के मामलों पर कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐसे पानी के किसी भी उपयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच रिपोर्ट में नाले के पानी में फीकल कोलीफॉर्म जैसे घातक तत्व पाए गए हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक हैं। 14 जनवरी को हुई सुनवाई के बाद यह आदेश शुक्रवार को जारी किया गया।
लॉ स्टूडेंट की चिट्ठी से जनहित याचिका
जबलपुर के लॉ स्टूडेंट समर्थ सिंह बघेल ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर शहर में नाले के पानी से सब्जियां उगाए जाने का मुद्दा उठाया था। हाईकोर्ट ने इस पत्र को जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार किया।
सुनवाई के दौरान अदालत मित्र के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा उपस्थित रहे।
खेती तो दूर, नहाने के भी लायक नहीं पानी
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, जिला कलेक्टर के नेतृत्व में गठित संयुक्त टीम ने ओमनी नाला, मोती नाला, खूनी नाला, उदरना नाला और ओमती नाला सहित कई स्थानों से पानी के नमूने लिए।
जांच में स्पष्ट हुआ कि यह अशोधित सीवेज है, जो खेती, पीने और यहां तक कि नहाने के लिए भी पूरी तरह अनुपयुक्त है।
174 MLD सीवेज, उपचार सिर्फ 75.14 MLD
रिपोर्ट में बताया गया कि जबलपुर शहर में प्रतिदिन लगभग 174 MLD सीवेज उत्पन्न होता है। शहर में कुल 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 104.33 MLD है, लेकिन वास्तव में केवल 75.14 MLD सीवेज का ही उपचार हो पा रहा है।
इसके चलते प्रतिदिन करीब 98 MLD से अधिक गंदा पानी बिना उपचार के नालों में छोड़ा जा रहा है।
घर-घर सीवर कनेक्शन की भारी कमी
नगर निगम क्षेत्र में लगभग 3,00,070 घर हैं, जिनमें से केवल 73,875 घर ही सीवर लाइन से जुड़े हैं। शेष घरों का सीवेज सीधे नालों में जा रहा है, जो पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन है।
17.80 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा बकाया
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निर्देशों के तहत 01 जुलाई 2020 से 31 मार्च 2025 की अवधि के लिए ₹17.80 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा तय किया गया है। यह राशि अब तक नगर निगम जबलपुर द्वारा जमा नहीं की गई है। इसकी वसूली की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर को सौंपी गई है।
हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन को निम्न निर्देश दिए—
दूषित पानी का उपयोग खेती, पीने और नहाने के लिए तुरंत प्रतिबंधित किया जाए।
सभी 12 एसटीपी को उनकी पूर्ण क्षमता पर चालू किया जाए।
नालों में अपशिष्ट छोड़ने वाले उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की पहचान कर उन्हें निजी एसटीपी लगाने के निर्देश दिए जाएं।
सभी घरों और कॉलोनियों को मुख्य सीवर लाइन से जोड़ने की व्यवहार्यता जांचने के लिए समिति गठित की जाए।
नगर निगम को मिला समय
नगर निगम की ओर से पेश वकील ने 17.80 करोड़ रुपये के मुआवजे के भुगतान पर निर्देश लेने के लिए समय मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 04 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।







