भोपाल नगर निगम के अपर आयुक्त पर एफआईआर, 10 साल का डेटा ज़ब्त

भोपाल नगर निगम के अपर आयुक्त पर एफआईआर, 10 साल का डेटा ज़ब्त
भोपाल, यशभारत। मध्य प्रदेश की राजधानी के नगर निगममें करोड़ों रुपये के ‘फर्जी बिल घोटाले ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। लोकायुक्त पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए निगम के अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है और शुक्रवार को निगम के मुख्यालय सहित तीन ठिकानों पर छापेमारी कर पिछले 10 साल का डिजिटल डेटा ज़ब्त कर लिया है।
कैसे हुआ करोड़ों का खेल
लोकायुक्त की जांच में सामने आया है कि यह पूरा घोटाला तकनीकी सेंधमारी और ई-बिलिंग के जरिए अंजाम दिया गया। आरोप है कि एसएपी सॉफ्टवेयर का दुरुपयोग कर उन कामों के भी बिल बना दिए गए जो जमीन पर कभी हुए ही नहीं। जलकार्य, सामान्य प्रशासन और केंद्रीय वर्कशॉप जैसे विभागों के नाम पर वाहनों की मरम्मत और पेंटिंग के फर्जी बिल तैयार किए गए। शुरुआती जांच के अनुसार, करोड़ों रुपये का भुगतान अधिकारियों के करीबियों और रिश्तेदारों की फर्जी फर्मों के खातों में ट्रांसफर किया गया।
लोकायुक्त की बड़ी कार्रवाई: मुख्य बिंदु
लोकायुक्त एसपी दुर्गेश राठौर के नेतृत्व में टीम ने सुबह 10:30 बजे एक साथ दबिश दी:
छापेमारी के स्थान: लिंक रोड-2 स्थित मुख्य कार्यालय, फतेहगढ़ स्थित पुराना कार्यालय और निगम का डाटा सेंटर।
FIR की धाराएं: अपर आयुक्त सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी की धाराओं में मामला दर्ज।
10 साल का रिकॉर्ड: जांच टीम ने निगम के मुख्य सर्वर और एसएपी सॉफ्टवेयर का पिछला 10 साल का पूरा डेटा अपने कब्जे में ले लिया है, जिससे कई और बड़े चेहरों के बेनकाब होने की उम्मीद है।
अपर आयुक्त का बचाव: जिम्मेदारी सबकी है
कार्यवाही के बाद अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बिल सीधे लेखा शाखा में तैयार नहीं होते। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिल संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद आते हैं और फंड की उपलब्धता के आधार पर नगर निगम आयुक्त (कमिश्नर) से चर्चा के बाद ही भुगतान की फाइल आगे बढ़ती है।
लोकायुक्त अब ज़ब्त किए गए डिजिटल डेटा का फॉरेंसिक ऑडिट करेगी। सूत्रों का मानना है कि ई-बिलिंग के इस खेल में केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि आईटी सेल के कर्मचारी और कई बड़े ठेकेदार भी शामिल हो सकते हैं।







