वर्सोवा–भायंदर कोस्टल रोड परियोजना पर हुआ विवाद
पर्यावरणविद् स्टालिन डी ने मैंग्रोव कटाई को लेकर बीएमसी और मैंग्रोव सेल को भेजा कानूनी नोटिस

वर्सोवा–भायंदर कोस्टल रोड परियोजना पर हुआ विवाद
पर्यावरणविद् स्टालिन डी ने मैंग्रोव कटाई को लेकर बीएमसी और मैंग्रोव सेल को भेजा कानूनी नोटिस
मुंबई,यश भारत पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्था वानशक्ति के पर्यावरणविद् स्टालिन डी ने वर्सोवा–भायंदर कोस्टल रोड परियोजना के तहत मैंग्रोव कटाई की अनुमति को लेकर मैंग्रोव सेल और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को कानूनी नोटिस जारी किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि यह अनुमति आवश्यक वैधानिक मंजूरियों के बिना दी गई, जो वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2 और 12 दिसंबर 2025 के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।
स्टालिन डी ने यह कानूनी नोटिस 3 फरवरी को भेजा, जिसकी प्रतियां वन विभाग के प्रधान सचिव, पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव, मैंग्रोव सेल, नगर आयुक्त और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव को ईमेल के जरिए भेजी गई हैं। उन्होंने परियोजना से जुड़े सभी कार्य तत्काल रोकने और शमन (मिटिगेशन) उपायों में खामियों को दूर करने की मांग की है।
नोटिस में कहा गया है कि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मैंग्रोव कटाई की अनुमति दी गई है, जबकि जमीनी हकीकत इससे भी आगे निकल चुकी है। स्टालिन डी ने दावा किया कि मालाड क्रीक के मालवणी इलाके में मैंग्रोव क्षेत्र के भीतर लगभग एक किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण पहले ही हो चुका है। उनके अनुसार, यह काम बॉम्बे हाईकोर्ट के दिसंबर 2025 के आदेश के बाद किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता था। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत के आदेशों को हल्के में लेते हुए बिना अनुमति के काम किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना के फेज-2 के लिए अब तक अंतिम मंजूरी नहीं ली गई है। स्टालिन डी के अनुसार, भले ही इसे एक ‘लीनियर प्रोजेक्ट’ मान लिया जाए, फिर भी अंतिम क्लियरेंस के बिना निर्माण शुरू नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब हाईकोर्ट से अनुमति ली जा रही थी, तब अदालत को यह क्यों नहीं बताया गया कि परियोजना के पास आवश्यक मंजूरियां और वन संरक्षण अधिनियम की शर्तों की पूर्ति नहीं है।
स्टालिन डी ने प्रतिपूरक वनीकरण (कंपनसेटरी अफॉरेस्टेशन) पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उनके मुताबिक, चंद्रपुर जिले के ताडोबा के पास विहिरगांव, सर्वे नंबर 342 की जो जमीन मुआवजे के तौर पर दिखाई जा रही है, वह पहले से ही वन विभाग के नाम पर दर्ज है और ईंधन लकड़ी व चराई के लिए आरक्षित है। ऐसे में वहां नए पौधों के जीवित रहने और संरक्षण पर उन्होंने संदेह जताया।
भायंदर में जहां एक लाख पौधे लगाने की बात कही जा रही है, वह जमीन भी सर्वे नंबर 342 की ही है, जिसे मैंग्रोव सेल ने 2022 में पहले ही विकसित (अफॉरेस्ट) किया था। सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार वहां नए पौधारोपण के लिए जगह बहुत कम बची है। इसके अलावा, भूमि अभिलेख बताते हैं कि यह जमीन नमक विभाग, राज्य वन विभाग और मीरा-भायंदर महानगरपालिका (एमबीएमसी) के संयुक्त स्वामित्व में है। एमबीएमसी इस क्षेत्र में वॉटरफ्रंट विकास की योजना भी बना रही है, जिससे मैंग्रोव संरक्षण पर खतरा बढ़ सकता है।
स्टालिन डी ने सवाल उठाया कि समुद्री तटीय पारिस्थितिकी तंत्र वाले मैंग्रोव जंगलों की भरपाई चंद्रपुर जैसे पहाड़ी इलाके में पेड़ लगाकर कैसे की जा सकती है। उन्होंने पूछा कि क्या मुंबई या मुंबई महानगर क्षेत्र के तटवर्ती इलाकों में कोई जमीन उपलब्ध नहीं थी, जहां इस नुकसान की भरपाई हो सके। साथ ही उन्होंने परियोजनाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सोच की कमी पर भी सवाल उठाए।
वन विभाग के इस दावे पर कि मालवणी में काम केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए है, स्टालिन डी ने इसे “झूठा” बताया और कहा कि साइट से ली गई तस्वीरें कुछ और ही दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि स्टेज-II क्लियरेंस के बिना मैंग्रोव कटाई की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती थी। स्टालिन डी के मुताबिक, लगभग 1.6 लाख मैंग्रोव के नुकसान की जिम्मेदारी अकेले बीएमसी की है और जिस तेजी से मैंग्रोव नष्ट हो रहे हैं, उससे मुंबई के तटीय जंगलों का भविष्य गंभीर खतरे में है।







