मौनी अमावस्या पर नर्मदा में आस्था का महास्नान: जबलपुर के घाटों पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
“हर हर नर्मदे” से गूंज उठा तट

जबलपुर,यशभारत। जबलपुर में मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर रविवार को आस्था और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। तड़के सुबह से ही नर्मदा नदी के प्रमुख घाट—ग्वारी घाट, तिलवारा घाट और भेड़ाघाट—पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। जबलपुर सहित आसपास के जिलों से आए हजारों भक्तों ने मौन व्रत का पालन करते हुए नर्मदा में पुण्य स्नान किया और दान-पुण्य कर पितरों की शांति व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
नर्मदा स्नान का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या पर मौन रहकर किया गया नर्मदा स्नान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन स्नान करने से पापों का नाश, अक्षय पुण्य की प्राप्ति और पितरों को शांति मिलती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि नर्मदा स्नान का फल त्रिवेणी संगम में स्नान के समान ही पवित्र और फलदायी होता है।
पितृ पूजा और दान-पुण्य
इस अवसर पर घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पितृ तर्पण, पिंडदान और विशेष पूजा-अर्चना की। अन्न, वस्त्र, कंबल और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का दान किया गया। मान्यता है कि मौनी अमावस्या पर किया गया दान कई गुना फल देता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
प्रशासन की कड़ी व्यवस्था
भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। घाटों पर पुलिस बल, होमगार्ड और गोताखोरों की तैनाती की गई। यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए, वहीं किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य और राहत दल भी मुस्तैद रहे। प्रशासन की सतर्कता के चलते आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
भक्तिभाव से गूंजते रहे घाट

स्नान के दौरान नर्मदा तटों पर “हर हर नर्मदे” के जयकारे गूंजते रहे। ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह और आस्था देखते ही बनती थी। भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिक शांति से ओत-प्रोत यह दृश्य न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
आस्था का पर्व, परंपरा की जीवंत तस्वीर
मौनी अमावस्या पर नर्मदा स्नान ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि जबलपुर की धार्मिक परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ जीवंत हैं। नर्मदा मैया की गोद में आस्था की यह डुबकी श्रद्धालुओं के लिए न केवल एक धार्मिक कर्म रही, बल्कि आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव भी बनी।







